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CM विजय ने किया इस फैसले का विरोध, कोर्ट ने लगाई फटकार, दे 3 महीने की मोहलत।

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हिंदी को लेकर आपको अपना माइंडसेट बदलने की जरूरत है। ऐसा नहीं हो सकता कि तमिलनाडु की धरती पर हिंदी पढ़ाई ही ना जाए। ऐसा सुप्रीम कोर्ट का कहना है। सुप्रीम कोर्ट में 17 सितंबर को तमिलनाडु सरकार और केंद्र सरकार के बीच हिंदी भाषा को लेकर बहस हुई। इसके पीछे वजह है नवोदय स्कूल।

दिसंबर 2025 में कोर्ट ने तमिलनाडु के हर जिले में नवोदय स्कूल खोलने के लिए राज्य सरकार से जमीन की पहचान करने का आदेश दिया था। राज्य सरकार ने इस आदेश को रद्द करने की अपील की है। कोर्ट ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। तमिलनाडु सरकार का कहना है कि केंद्र नवोदय स्कूल के जरिए जबरदस्ती हिंदी भाषा थोपने की कोशिश कर रही है।

नवोदय स्कूल केंद्र सरकार की मदद से चलने वाले बोर्डिंग स्कूल्स हैं। इसे नवोदय विद्यालय समिति चलाती है जो केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के तहत काम करती है।

तमिलनाडु सरकार लंबे समय से इन स्कूल्स का विरोध करती आई है। आपत्ति स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली भाषाओं को लेकर है। नवोदय स्कूल में तीन भाषा पढ़ाई जाती है। थ्री लैंग्वेज पॉलिसी जिसमें हिंदी भी शामिल है। तमिलनाडु सरकार 1968 से ही दो भाषा नीति मानती आ रही है। यानी सिर्फ तमिल और इंग्लिश पढ़ाई जानी चाहिए। राज्य सरकार का कहना है कि नवोदय स्कूल की लैंग्वेज पॉलिसी राज्य की नीति से अलग है।

एजुकेशन से जुड़े फैसले में राज्य के अधिकार का ध्यान रखना चाहिए। इसी वजह से तमिलनाडु सरकार अपने राज्य में यह स्कूल्स खोलने की इजाजत और जमीन देने से बचती रही है। तमिलनाडु सरकार ने दलील दी कोर्ट में कि देश में केंद्र और राज्यों के बीच मिलजुलकर काम करने की भावना की कमी दिख रही है। जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने कहा कि चेन्नई के लोगों को दिल्ली में बैठे लोगों से खुद को अलग नहीं समझना चाहिए। आप अपने राज्य में जो भी अच्छे काम कर रहे हैं अगर उनके साथ कुछ नया और जुड़ जाएगा तो इससे आपका स्तर कम नहीं होगा। कोई चीज दिल्ली से आ रही है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह चेन्नई के स्तर को गिरा देगी। चेन्नई वालों को दिल्ली वालों को पराया नहीं समझना चाहिए और ना ही दिल्ली वालों को वाइसवरसा।

इससे पहले मद्रास हाई कोर्ट केस की सुनवाई कर चुका है। कोर्ट ने कहा था कि नवोदय स्कूल खोलने से राज्य के तमिल लर्निंग एक्ट का कोई उल्लंघन नहीं होता है। राज्य सरकार का इन स्कूलों को पूरी तरह से नाकार देना बच्चों के अपनी पसंद का स्कूल चुनने के अधिकार को छीनता है। यह मद्रास हाईकोर्ट की तरफ से कहा गया था। हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया था कि वह जिले में 240 स्टूडेंट्स के लिए रहने की जगह मुहैया कराए। इसी फैसले के बाद तमिलनाडु सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची है। तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश सीनियर वकील जयदीप गुप्ता ने कहा यह राज्य की नीति के बिल्कुल खिलाफ है।

तमिल भाषा की जगह लेने जैसा है। इस तरह सब पर एक जैसी व्यवस्था थोपना संविधान की मंशा नहीं है। नवोदय कोई केंद्र सरकार का स्कूल नहीं बल्कि एक सोसाइटी द्वारा चलाया जाने वाला स्कूल है। इस बात की जबरन ज़िद की जा रही है कि हिंदी का ही दबदबा होना चाहिए। ऐसा सीनियर वकील ने कहा है। इस पर कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार को स्कूल बनाने के लिए जमीन देनी ही होगी। हम यह नहीं मान सकते कि केंद्र सरकार की किसी नीति को अपनाना या ना अपनाना पूरी तरह राज्य की मर्जी पर छोड़ दिया जाए। इस पर वकील जयदीप गुप्ता ने दलील दी कि यह नीति ऑप्शनल है और अगर कोर्ट इसे लागू करने का सख्त आदेश देती है तो इससे पिछले 75 बरसों से चली आ रही व्यवस्था बिगड़ जाएगी। जवाब में जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि नवोदय स्कूल्स के लिए जो सामान्य नीति बनी है राज्य को उसका पालन करना ही होगा।

वकील जयदीप गुप्ता ने जवाब दिया कि हो सकता है राज्य की नीति केंद्र से बेहतर हो और इसे लागू करने को लेकर राज्य सरकार केंद्र के साथ बैठकर बातचीत करने को तैयार है। हम हमें यह देखना होगा कि मिलकर काम करने की भावना सिर्फ एक तरफ़ा से चलती है या दोनों तरफ से। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की किकिर राज्य में सरकार बदल चुकी है इसलिए कोर्ट को उम्मीद है कि अब उनका माइंडसेट भी बदल जाएगा। वकील जयदीप गुप्ता ने दलील दी कि मिलकर काम करने की भावना सिर्फ एक तरफ से नहीं होती है और इस तरह के नीतिगत मामलों को कोर्ट जबरन लागू नहीं करवा सकती।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज किया और कहा हमारे पिछले आदेश का पालन कीजिए। हम आपसे जमीन का अधिग्रह करने के लिए नहीं कह रहे हैं। हम सिर्फ जमीन की पहचान करने को कह रहे हैं। हमें हर किसी की भलाई की चिंता है। आपस में बातचीत की जरूरत है। आप सीधे यह नहीं कह सकते कि हम यह नीति मानेंगे ही नहीं। मामला शिक्षा का है। आज कल किसी और चीज का होगा। आपको इस पर नरमी बरतनी ही होगी। वकील जयदीप गुप्ता ने इस पर कहा कि इन स्कूलों का खर्च आखिरकार राज्य सरकार के सिर पर ही पड़ेगा। शिक्षकों के वेतन के लिए आखिर में हमारी ओर ही देखा जाएगा और केंद्र भुगतान नहीं करेगा। इस मामले में केंद्र का पुराना रिकॉर्ड बेहद खराब रहा है। उन्होंने अभी तक सर्व शिक्षा अभियान का पैसा नहीं चुकाया है। यह पूरी तरह से पॉलिटिक्स है।

इस टिप्पणी पर कोर्ट अपनी बात पर कायम रहा और कोर्ट का कहना है कि यह केवल माइंडसेट का मामला है। बेंच ने कहा आप केंद्र से बातचीत कीजिए। बातचीत के बाद भी अगर कोई समस्या आती है तो हमें बताइए। इससे आपकी शिक्षा का स्तर गिरेगा नहीं बल्कि बच्चों को और ज्यादा मौके मिलेंगे। केंद्र की तरफ से पेश एडिशनल सॉललीिसिटर जनरल के एम नटराज ने साफ किया कि राज्य सरकार को सिर्फ जमीन देनी है। बाकी सारा खर्च और व्यवस्था केंद्र सरकार खुद संभालेगी।

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