नोएडा के एक लॉ स्टूडेंट को ₹5 लाख का बॉन्ड भरने का नोटिस मिला था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। ने यानी को फटकार लगाते हुए यहां तक कह दिया कि आपकी हिम्मत कैसे हुई? अब छात्र अक्षय त्रिपाठी ने भी सवाल किया है कि नोटिस तो वापस हो गया लेकिन मैं यह जानना चाहता हूं कि आखिर मेरे खिलाफ यह कार्रवाई क्यों की गई थी?
अक्षत त्रिपाठी गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के सेकंड ईयर बीए के स्टूडेंट हैं। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में अक्षत ने कहा कि उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और उन पर लगाए गए आरोप बेबुनियाद है। उनका सवाल है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने के जुलाई में हुए प्रदर्शन से जुड़े मामलों में छात्रों के खिलाफ कारवाई नहीं करने को कहा था तो उनके खिलाफ यह नोटिस क्या सोचकर जारी किया गया?
दरअसल 4 सितंबर को अक्षत को ग्रेटर नोएडा के की तरफ से नोटिस भेजा गया था। इसमें उनसे 6 महीने तक शांति बनाए रखने के लिए ₹5 लाख का निजी बॉन्ड और इतनी ही रकम की दो जमानत देने को कहा गया था। अक्षत के मुताबिक उन्हें यह नोटिस 4 सितंबर की रात करीब 8:00 बजे WhatsApp पर मिला। अगले दिन उन्हें सूरजपुर में के सामने पेश होने के लिए कहा गया था। लेकिन पुलिस ने इस नोटिस को 5 सितंबर को ही रद्द कर दिया था।
नोएडा पुलिस ने 9 सितंबर को कहा कि नोटिस जारी करने में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय कारवाही भी शुरू कर दी गई है। पुलिस ने इसे गलत तरीके से जारी हुआ नोटिस बताया है। पुलिस के मुताबिक इस मामले में गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी की कोई भूमिका नहीं थी। लेकिन कहानी यही खत्म नहीं हुई। 9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले का जिक्र हुआ तो सूर्यकांत ने इस पर सख्त सवाल उठाया।
उन्होंने पूछा कि जब कोर्ट पहले से ही कह चुका है कि सीजीपी प्रदर्शन से जुड़े मामलों में छात्रों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी तो फिर ने नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की? साफ कहा कि कोर्ट पहले ही को खत्म कर चुका है और निर्देश दे चुका है कि इन मामलों में कारवाई नहीं की जाएगी।
इन प्रदर्शनों के सिलसिले में छात्रों के खिलाफ नई पनिशेबल एक्शन नहीं की जानी चाहिए। अब संबंधित अधिकारी से इस पर सफाई मांगी जा रही है। अब जान लेते हैं कि आखिर अक्षत के खिलाफ नोटिस में आरोप क्या लगाए गए थे।
पुलिस की रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि अक्षत यूनिवर्सिटी के दूसरे छात्रों के बीच सरकार विरोधी और बातें फैला रहे थे और उन्हें सीजेपी के प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसा रहे थे।
रिपोर्ट में कहा गया था कि इससे सार्वजनिक शांति होने की आशंका है। इसी रिपोर्ट के आधार पर ने यानी भारतीय नागरिक के तहत अक्षत को जारी किया। नोटिस में कहा गया था कि उनकी ओर से शांति किए जाने की मजबूत संभावना है।
लेकिन अक्षत ने इन आरोपों को पूरी तरह से खारिज किया। उनका कहना है कि उन्होंने 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन में हिस्सा लिया था और उस दौरान लाठीचार्ज में घायल भी हुए थे। लेकिन इसके बाद वो अपनी यूनिवर्सिटी गए ही नहीं। अक्षत के मुताबिक वो 25 मई के बाद यूनिवर्सिटी नहीं गए थे। यूनिवर्सिटी में छुट्टियां थी और बाद में करीब एक महीने तक क्लास ऑनलाइन चली। जुलाई के ज्यादातर समय अक्षत इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंटर्नशिप कर रहे थे।
ऑफलाइन क्लास भी 7 सितंबर से ही दोबारा शुरू हुई है। ऐसे में उनका सवाल यह है कि जब वो यूनिवर्सिटी में थे ही नहीं, तो वहां के छात्रों को का आरोप उन पर कैसे लगाया गया? अक्षत का कहना है कि नोटिस में लगाए गए आरोपों का कोई सीधा और भरोसेमंद आधार उन्हें नहीं बताया गया।
उन्होंने 5 सितंबर को को जवाब देते हुए कहा था कि सिर्फ शक के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसी कारवाई करना उचित नहीं है। बता दें कि अक्षत गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी में यानी अक्षत ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि नीट यूजी पेपर रद्द होने से उनके कई करीबी दोस्त अफेक्ट हुए थे और वह उनके लिए जवाबदेही की मांग करना चाहते थे। अब एक बार नजर डाल लेते हैं मामले की सबसे अहम टाइमलाइन पर। जुलाई में सीजेपी की ओर से दिल्ली में प्रदर्शन हुए। 20 जुलाई को अक्षय भी जंतरमंतर के प्रदर्शन में शामिल हुए थे।
1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सीजेपी के जुलाई के प्रदर्शनों से जुड़ी एफआईआर को खत्म कर दिया था। कोर्ट ने आर्टिकल 142 के तहत अपनी स्पेशल पावर का इस्तेमाल करते हुए छात्र के खिलाफ दर्ज मामलों को रद्द करने का आदेश दिया था। 4 सितंबर को अक्षत को ₹5 लाख के बॉन्ड वाला नोटिस मिल गया। और यही वह बात है जिसने पूरे मामले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा दिया।
अक्षत ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दाखिल की। उनका कहना है कि उन्हें आरोपों के पीछे मौजूद जानकारी नहीं दी गई है। जबकि ऐसी कार्रवाही में व्यक्ति को अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों की जानकारी देकर जवाब देने का मौका मिलना चाहिए। अब पुलिस ने नोटिस वापस ले लिया है और संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कारवाई भी शुरू कर दी है।
लेकिन अक्षत अभी भी इस सवाल का जवाब चाहते हैं कि आखिर उनके खिलाफ यह नोटिस जारी किस आधार पर हुआ। पुलिस ने इसे गलती मानकर नोटिस तो वापस ले लिया है लेकिन अब संबंधित अधिकारी को सुप्रीम कोर्ट के सामने इसका जवाब देना होगा।