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चीनी की कमी की खबर झूठी? असली खेल तो ये लोग कर गए!

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चीनी के दामों की रफ्तार ऐसी ही जारी रही तो महंगाई के कारण दम निकल जाएगा। लेकिन जिस कच्ची चीनी का आयात भारत कर रहा है वह है क्या? और क्या आपने सरकार का वो प्रेस रिलीज देखा जिससे यह पता लगता है कि चीनी की कमी का असली कारण क्या है? दरअसल 28 जुलाई को ही सरकार ने इसका अंदेशा दे दिया था कि चीनी की किल्लत परेशान कर सकती है और चीनी विदेशों से मंगाई जा सकती है। सबसे पहले समझिए कि भारत कच्ची चीनी क्यों मंगा रहा है और यह कच्ची चीनी है क्या? तो कच्ची चीनी को अंग्रेजी में बोलेंगे रॉ शुगर। रॉ शुगर यानी कच्ची चीनी गन्ने की पहली पेराई से बनती है जिसे बहुत कम प्रोसेस किया जाता है जिसे हम थोड़ा आसान भाषा में अनफिल्टर्ड चीनी कह सकते हैं। इसमें थोड़ी मात्रा में मोलेसिस मौजूद रहता है। इसमें पूरी तरह से रिफाइन की गई सफेद टेबल शुगर की तुलना में हल्का कैरेमल जैसा स्वाद मिलता है। मसलन भूरा भूरा सा। कच्ची चीनी को रिफाइन करने के लिए उस पर से मोलिसिस की परत को धोकर हटा दिया जाता है। फिर चीनी को पिघलाया जाता है। उससे सिरप बनाया जाता है और जो अशुद्धियां हैं, जैसी इंप्योरिटीज हैं,

उनको छानकर अलग किया जाता है। सिरप को फिर से उबाला जाता है। शुद्ध सफेद चीनी के क्रिस्टल फिर बनाए जाते हैं और वह आप तक पहुंचते हैं। लेकिन चीनी की बढ़ती कीमतों के पीछे जो कारण है वह सरकार के एक नोटिस में था। जिस पर बहुत कम लोगों की नजर गई। यह है सरकार का वो प्रेस रिलीज जिसका हम जिक्र कर रहे हैं। इसमें जिक्र है एक शब्द का। ध्यान से देखेंगे तो इसमें एक शब्द लिखा है जमाखोरी। तो क्या चीनी की किल्लत और महंगाई का कारण जमाखोरी है? सरकार का कहना है देश में चीनी की कमी नहीं है बल्कि जमाखोरी और सट्टेबाजी के कारण आर्टिफिशियल कमी का माहौल बनाया जा रहा है जिससे कीमतें बढ़ रही हैं। इसलिए अब कारोबारियों के स्टॉक पर निगरानी और सीमा दोनों लागू की गई है। सरकार ने दरअसल पाया था कि हाल के दिनों में चीनी की मिल से निकलने वाली कीमतों यानी एक्स मिल प्राइस में बढ़ोतरी जो हुई है वह मौजूदा मांग और आपूर्ति की स्थिति के अनुरूप नहीं है।

यही जिक्र सरकार ने इस प्रेस रिलीज में किया था। सरकार ने इसमें लिखा कि सरकार के संज्ञान में यह भी आया है कि कुछ व्यापारियों, डीलरों और बाजार के बिचोलियों द्वारा चीनी की जमाखोरी, सट्टेबाजी और बिना वास्तविक रूप से चीनी की खरीद बिक्री या आवाजाही केवल कागजी लेनदेन किए जा रहे हैं। सरकार के मुताबिक इन गतिविधियों ने बाजार में चीनी की कृत्रिम कमी का माहौल बनाया। इसके कारण चीनी की कीमतों में अनावश्यक उतार-चढ़ाव आया और मिल स्तर से लेकर खुदरा बाजार तक कीमतों में बढ़ोतरी हुई। भारत सरकार ने 28 जुलाई 2026 को आदेश संख्या एसओ4165 ई जारी किया जो आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 की धारा तीन और शुगर कंट्रोल ऑर्डर 2025 के अंतर्गत चीनी व्यापारियों द्वारा रखे जाने वाले स्टॉक की सीमा निर्धारित करता है ताकि जमाखोरी को रोका जा सके और बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। इस आदेश के मुताबिक अब किसी भी चीनी व्यापारी द्वारा चीनी का स्टॉक प्राप्ति की तारीख से 30 दिनों से ज्यादा अवधि तक नहीं रखा जा सकेगा। साथ ही किसी भी वक्त और किसी भी जगह पर 4000 क्विंटल मतलब 400 मीट्रिक टन से ज्यादा

चीनी का स्टॉक नहीं रखा जा सकेगा। इस आदेश के मुताबिक सभी चीनी व्यापारियों के लिए खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के पोर्टल फूड स्टॉक.fpd.gov.in पर रजिस्ट्रेशन करना और अब अपने चीनी स्टॉक की स्थिति तत्काल घोषित करना। उसके बाद हर एक शुक्रवार को नियमित रूप से अध्यतन करना अनिवार्य है। चीनी की जमाखोरी यानी होर्डिंग तब होती है जब थोक व्यापारी, मिल मालिक या बिचौलिए बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करने और कीमतें बढ़ाने के मकसद से भारी मात्रा में चीनी का अवैध रूप से स्टॉक कर लेते हैं। भंडारण कर लेते हैं। मुनाफाखोर चीनी की इस रोकी गई सप्लाई को तब बाजार में निकालते हैं जब मांग चरम पर होती है। यानी फायदा ही फायदा ताकि वह इसको ऊंचे दाम पर बेचे और मोटा मुनाफा कमा लें। सरकार ने उपभोक्ताओं को आश्वस्त किया है कि देश में घरेलू खपत की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त मात्रा में चीनी मौजूद है। अब इथेनॉल कार्यक्रम ने किस तरीके से चीनी मिलों और किसानों की माली हालत सुधारी है। यह भी एक सवाल बनता है क्योंकि सरकार यह दावा भी करती रही है कि इथेनॉल की वजह से जो चीनी मिले हैं और जो किसानों की हालत है वह बड़ी सुधरी है। तो क्या है इसमें सच्चाई? यह जरा टटोलते हैं।

भारत आमतौर पर सालाना 32 से 34 मिलियन टन चीनी का उत्पादन करता है। जबकि घरेलू खपत 28 से 29 मिलियन टन है। अधिशेष के वर्षों में मिलों की कार्यशील पूंजी अटकने से किसानों के भुगतान में देरी होती थी। इथेनॉल कार्यक्रम ने इस ढांचागत अधिशेष की समस्या को सुलझाया और मिलों को मजबूत वित्तीय आधार दिया। मिलों की वित्तीय स्थिति सुधरने से 20 अगस्त तक 2025 से 26 सीजन के गन्ना बकाए का 97% भुगतान किया जा चुका है। साथ ही सब्सिडी पर मिलों की निर्भरता कम हुई है। 2014 से 2021 के बीच सरकार ने 14,600 करोड़ की सब्सिडी दी थी। लेकिन 2021 से 22 के बाद से कोई नई सब्सिडी जारी नहीं की गई। इन सबके बीच मौसम की मार का बड़ा जिक्र हो रहा है। अनियमित बारिश, सूखा मौसम जो जिस तरीके से नजर आ रहा है उसने गन्ने के उत्पादन पर असर डाला है। अधिकारी कहते हैं पिछले साल अक्टूबर में महाराष्ट्र में बहुत ज्यादा बारिश हुई। साथ ही यूपी और महाराष्ट्र में गन्ने की फसल में रेड रोट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों की वजह से उत्पादन पर असर पड़ा। साथ ही दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादक देश ब्राजील में सप्लाई की बिगड़ती स्थिति ने भी चीनी की कीमतों में भारी उछाल ला दिया। ब्राजील ने दरअसल खराब मौसम के कारण फसल की कटाई में देरी की चेतावनी दी। अनिश्चितता को और बढ़ाते हुए ब्राजील ने अपनी हर दो हफ्ते में आने वाली फसल और उत्पादन रिपोर्ट को रोक दिया।

इससे देश की सप्लाई की स्थिति के बारे में जानकारी मिलना मुश्किल हो गया। इस बीच इथेनॉल की ओर झुकाव चीनी की संभावित कमी को लेकर चिंताएं बढ़ा रहा है। इन सबके बीच आपको बता दें ब्राजील के 58% गन्ने के रस का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में होता है। इससे चीनी की तुलना में बेहतर मुनाफा मिलने की उम्मीद भी रहती है। तो अब आपको समझ में आ गया होगा कि बाजार में चीनी की बढ़ती कीमतें और चीनी की किल्लत पर सरकार ने एक-एक करके हर एक चीज का जवाब दे दिया। अगर फिर भी आपको लगता है कि चीनी की इस बढ़ती कीमत का और किल्लत की कोई और वजह हो सकती है तो प्लीज कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताइएगा।

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