1971 की फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’ के लिए उनकी कुल फीस थी (यानी दोनों को 5,000-5,000 रुपए मिले थे)। इस फिल्म के बाद राजेश खन्ना ने उन्हें स्क्रीनप्ले का क्रेडिट और उचित पैसा देने का वादा किया था जो पूरा नहीं हुआ, जिससे उनके रिश्ते में खटास आई थी,उस समय फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुई और राजेश खन्ना को 5 लाख रुपए मिले, जबकि लेखकों के रूप में सलीम-जावेद को कुल 10,000 रुपए ही दिए गए।
इतना ही नहीं इस फिल्म के दौरान राजेश खन्ना और निर्देशक ने उन्हें क्रेडिट देने का भी वादा किया था जो कि उन्होंने पूरा नहीं किया।
हालांकि अगर इनकी जोड़ी टूटने की असली वजह की बात करें तो एक इंटरव्यू के दौरान जावेद अख्तर ने कहालेखन साझेदारी को बनाए रखना अक्सर मुश्किल होता है, क्योंकि वे एक मजबूत मानसिक तालमेल पर निर्भर करते है, जैसा कि मेरे और सलीम के बीच एक समय था.’
इंटरव्यू में जावेद ने खुलासा किया कि ‘साझेदारी सीमेंट फैक्ट्री में करना आसान है, क्योंकि उसमें आप जानते हैं कि सीमेंट बनाने की क्या कीमत है, बाजार में उसकी कीमत क्या है? लेखन में साझेदारी एक गेंद का खेल है. आपके पास अगर कोई तराजू या तौलने की मशीन नहीं है, जिस पर आप एक दृश्य रख सकें और उसका वजन तय कर सकें, ये केवल महसूस करने की बात है.’
क्रेडिट और पैसों को लेकर बात करते हुए जावेद साहब ने कहा कि ‘हमने कभी लड़ाई नहीं की, क्रेडिट को लेकर कोई मुद्दा नहीं था, पैसे को लेकर कभी कोई मुद्दा नहीं था, कुछ भी नहीं था. हम बस अलग हो गए. हमें एहसास हुआ कि अब रिश्ते नहीं रहे, अब हम शाम को साथ नहीं बैठते, हमारे अपने दोस्त हैं. धीरे-धीरे ऐसा हुआ और तालमेल कमजोर हो गया और इसका असर हमारे काम पर भी पड़ रहा था.’