दिल्ली में एक तरफ कॉकरोच जनता पार्टी और युवाओं का चलो संसद मार्च चल रहा है और दूसरी तरफ दिल्ली हाईकोर्ट में सोनम वांगचुक को लेकर सुनवाई भी चल रही है। यह सुनवाई उस याचिका पर हो रही है जो वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जयांगू ने दायर की है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचु को जबरन सफदर जंग हॉस्पिटल में रखा हुआ है ताकि वह दिल्ली में चल रहे विरोध प्रदर्शन में हिस्सा ना ले सके। मामले की सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कार्या की बेंच कर रही है। बेंच ने सबदाजंग हॉस्पिटल के डायरेक्टर को निर्देश दिया कि वह सोनम मांगचु की मेडिकल जांच से जुड़ी पूरी जानकारी हलफनामे के साथ कोर्ट में दाखिल करें।
खासतौर पर इसमें तीन अलग-अलग जगहों पर जांचे गए सैंपल्स की सारी पैथोलॉजिकल रिपोर्ट्स शामिल हो। यह रिपोर्ट सफदर जंग हॉस्पिटल, एम्स और एक प्राइवेट लैब से तैयार की गई हैं। इस तरह दिल्ली हाईकोर्ट ने 20 जुलाई को एक्टिविस्ट सोनम वांगचू की हेल्थ कंडीशन को लेकर एक विस्तृत मेडिकल रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने कहा मौजूदा परिस्थितियों और दोनों पक्षों की दलीलों को देखते हुए हम निर्देश देते हैं कि सफदर हॉस्पिटल, एम्स और प्राइवेट लैब में जांचे गए सैंपल्स की सभी पैथोलॉजिकल रिपोर्ट्स हॉस्पिटल के डायरेक्टर की ओर से हलफनामे के साथ दाखिल की जाए। कोर्ट ने गीतांजलि जय आंगमों को भी निर्देश दिया कि जिन मेडिकल रिपोर्ट्स का हवाला वो दे रही हैं उन्हें भी रिकॉर्ड में पेश किया जाए।
इसके अलावा हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि इस मामले में सोनम वांगचुक के ट्रीटमेंट से जुड़े सभी डॉक्टर्स अगली पेशी के दौरान कोर्ट में मौजूद रहें। कोर्ट ने कहा कि हम रिक्वेस्ट करते हैं कि एम्स के इंचार्ज डॉक्टर और इलाज में शामिल बाकी कंसल्टिंग और ट्रीटिंग डॉक्टर्स 21 जुलाई के सुनवाई के दौरान कोर्ट में मौजूद रहें। सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए।
उन्होंने दलील रखी कि इस मामले में शासन की तरफ भी एक अहम जिम्मेदारी है। उनका कहना था कि अगर सोनम वांछु की तबीयत ज्यादा बिगड़ती है या उनकी जान को कोई खतरा होता है तो उसका असर कानून व्यवस्था पर पड़ सकता है। इसके बाद उन्होंने इस मामले को इच्छा मृत्यु से जोड़कर कुछ बातें कही। सरकार की ओर से तुषार मेहता कहते हैं कि हम यहां इच्छा मृत्यु जैसे किसी मामले से नहीं निपट रहे हैं।
हम ऐसे शख्स के मामले से निपट रहे हैं जिसे विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है। लेकिन अगर कोई कहे कि जब तक उसकी मांगे पूरी नहीं होंगी तब तक वह खुद की जान ले लेगा तो वहां पब्लिक इंटरेस्ट का सवाल सामने आ जाता है। तुषार मेहता ने कहा कि ऐसी स्थिति में शासन का कर्तव्य है कि उस व्यक्ति की सेहत को और ज्यादा खराब ना होने दिया जाए।
यह दलील सोनम वांगचुक के उस अनिश्चितकालीन अनशन से जोड़कर दी गई जो उन्होंने 28 जून को शुरू किया था। तभी से दिल्ली के जंतरमंतर पर सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे थे। उन्होंने यह अनशन कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के आंदोलन के सपोर्ट में यह शुरू किया था। इस आंदोलन की मुख्य मांग थी कि बार-बार हो रहे एग्जाम पेपर लीक के लिए जवाबदेही तय की जाए और केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपना इस्तीफा दें। अनशन शुरू होने के करीब 3 हफ्ते बाद 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस ने उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति का हवाला देते हुए वांगशु को प्रदर्शन स्थल से जबरन उठाकर सबदर हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया। सोनम वांगशु की पत्नी गीतांजलि ने आरोप लगाया कि पुलिस की यह कार्यवाही उनकी सहमति के बगैर की गई। इसी के साथ ठीक अगले ही दिन यानी 19 जुलाई को गीतांजलि जंगो ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
उन्होंने मांग रखी कि सोनम वांगचुक को किसी प्राइवेट हॉस्पिटल में शिफ्ट करने की इजाजत दी जाए। पिटीशन में कहा गया कि ट्रीटमेंट को लेकर सफदाज जंग हॉस्पिटल की पारदर्शिता पर परिवार का भरोसा खत्म हो चुका है। उन्होंने कहा कि परिवार को ना तो इलाज की पूरी जानकारी दी जा रही है और ना ही मेडिकल रिपोर्ट्स शेयर की जा रही हैं। आंगो की ओर से पेश वकील ने यह भी इल्जाम लगाया कि वांगचुक को जिस तरह हॉस्पिटल में रखा गया है वो इललीगल डिटेंशन यानी गैरकानूनी हिरासत जैसा है। हालांकि 19 जुलाई को ही हाईकोर्ट के सिंगल जज बेंच ने पहली नजर में यह माना कि सोनम वांगचू को हॉस्पिटल शिफ्ट करने का सरकार का यह फैसला मनमाना नहीं था। इसी आधार पर कोर्ट ने अंतरिम राहत देने से इंकार कर दिया और उन्हें सफदर जंग हॉस्पिटल से किसी दूसरे हॉस्पिटल में शिफ्ट करने की मांग को भी खारिज कर दिया।
इसी सिंगल बेंच ऑर्डर को गीतांजलि ने डिवीजन बेंच के सामने चैलेंज किया। अपनी अपील में उन्होंने कहा कि सिंगल बेंच का ऑर्डर सोनम वांगचु के अपने अधिकार को प्रभावी रूप से खत्म करता है। जबकि उन्हें इलाज से जुड़े अपने फैसले लेने का पूरा अधिकार है। उनके मुताबिक इस ऑर्डर से वांगचुक के इलाज से जुड़े आखिरी फैसले का अधिकार पूरी तरह से डॉक्टर्स की टीम के हाथों में चला जाता है। संविधान के आर्टिकल 21 के तहत गीतांजलि ने अपने तर्कों को रखा। वहीं सरकार का कहना है कि यह कदम दिल्ली हाई कोर्ट के एक दूसरे ऑर्डर के परिपालन में उठाया गया। बताया गया कि वांगचुक को जंतरमंतर प्रोटेस्ट साइट से हॉस्पिटल ले जाने से दो दिन पहले हाई कोर्ट की ही एक डिवीजन बेंच ने सरकार को निर्देश दिया था कि वह सोनम वांगचुक की सेहत को रेगुलरली मॉनिटर करें और अगर स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा है तो जरूरी मेडिकल इंटरवेंशन करें। लेकिन आंगवो की अपील में कहा गया कि जिस मामले में यह आर्डर आया उसमें ना तो सोनम वांगचुक पक्षकार थे और ना ही गीतांजलि आंगवो।
इसके अलावा उनका कहना है कि 16 जुलाई के उस आदेश में सिर्फ उनकी मेडिकल निगरानी की इजाजत दी गई थी। उसमें कहीं भी यह नहीं कहा गया था कि उन्हें जबरन प्रदर्शन स्थल से हटाया जाए या फिर सरकारी हॉस्पिटल में उनकी इच्छा के खिलाफ लगातार रखा जाए।
अब ऐसे में सोनम वाचू की डिटेल मेडिकल रिपोर्ट कोर्ट के सामने आने के बाद क्या होता है? यह अगला सवाल है। जो भी अपडेट होगा हम आप तक पहुंचाएंगे।