एक साथ 38 लोगों को की सजा। यह किसी बीते दौर की खबर नहीं है। मंगलवार 7 जुलाई को 2008 के अहमदाबाद सीरियल केस में गुजरात हाईकोर्ट ने विशेष अदालत का फैसला बरकरार रखा है। मामले में कुल 49 लोगों को दोषी पाया गया था। उनमें से 38 को और 11 को उम्र कैद की सजा दी गई है।
एक ही केस में इतने सारे लोगों को सजा देने के चलते यह एक दुर्लभ निर्णय माना जा रहा है। 26 जुलाई 2008 को महज 70 मिनट के भीतर अहमदाबाद के अलग-अलग इलाकों में 21 सिलसिलेवार बम हुए थे। धमाकों में 56 लोगों की हुई जबकि 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे।
गुजरात हाईकोर्ट के फैसले पर बात करेंगे। साथ ही जानेंगे फरवरी 2022 में सुनाया गया विशेष अदालत का फैसला जिसे हाईकोर्ट ने बरकरार रखा है। लेकिन उससे पहले एक रिककैप अहमदाबाद का जिसने इस मामले को रेस्ट ऑफ द रेयर बनाया। कुछ आपबीतियां। 32 साल के डॉक्टर प्रेरक शाह अपनी 28 साल की पत्नी किंजल के साथ अहमदाबाद सिविल हॉस्पिटल पहुंचे।
तो वहां अफरातफरी और बदहवासी का आलम था। बड़ी संख्या में आपातकालीन कर्मी पहुंच रहे थे। रक्तदान करने वाले, मीडिया वाले और डॉक्टर तो थे ही। प्रेरक शाह इसी अस्पताल में ऑर्थोपेडिक थे। जबकि किंजल गनेकोलॉजिस्ट से अपनी जांच करवाने आई थी। वो 3 महीने प्रेग्नेंट थी। पिछले 1 घंटे में शहर में कई जगह बम हुए थे। इस बीच सिविल अस्पताल ही वह जगह थी जहां उम्मीद बांधे लोग पहुंच रहे थे।
सेंटर के ठीक बाहर पार्किंग थी। शाम के तकरीबन 7:40 हुए होंगे जब यहां खड़ी एक Maruti कार में बम हुआ। जोरदार आवाज के साथ एक कौंधती नीली रोशनी फैल गई। यह उस रोज अहमदाबाद में हुए सीरियल के क्रम में 16वां था। 10 लोग मारे गए। इनमें डॉक्टर प्रेरक शाह, उनकी पत्नी किंजल और उन दोनों का अजन्मा बच्चा शामिल थे।
उनकी शादी को एक साल हुआ था। यह संयोग नहीं था कि उस दिन शुरुआती और सिविल अस्पताल में हुए में 1 घंटे का अंतर था। यह जानबूझकर किया गया था क्योंकि ब्लास्ट करवाने वाले आतंकवादी जानते थे कि बाकी धमाकों की चपेट में आए लोगों को अस्पताल लाया जाएगा। वह चोट का असर बढ़ाना चाहते थे। एक और अस्पताल टारगेट किया गया। सिविल हॉस्पिटल से करीब 7 कि.मी. दूर एलजी हॉस्पिटल।
यहां चार लोग मारे गए। वहीं मस ऑपरेंडी। Maruti 800 में कार में बम। धमाके के एक चश्मदीद पवन पुरोहित ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया था एक Maruti हवा में उड़ी और बहुत तेज आवाज के साथ जमीन पर आटकी। कुछ संजय पासवान जैसे भी थे जिनकी उस रोज दो-दो धमाकों से भेंट हुई। एक और घायल होकर इलाज करवाने पहुंचे तो दूसरा पूरी के साथ अस्पताल में उनका इंतजार कर रहा था।
2008 का 63 साल जयपुर से मुंबई। यह पहली बार था जब अस्पताल को आतंकी हमले का निशाना बनाया गया था। कुछ धमाके बसों में हुए। कुछ में साइकिलों को कैरियर बनाया गया। कुछ कारों में तो कुछ सार्वजनिक स्थानों पर लगे कचरे के डिब्बों में। हमले की जिम्मेदारी ली आईएम यानी इंडियन मुजाहदीन नाम के एक संगठन ने। बम फटने से कुछ ही मिनट पहले टीवी चैनलों को एक ईमेल मिला। इसमें इंडियन मुजाहदीन के कथित मैनिफेस्टो का अंश था और की जिम्मेदारी ली गई थी। फ्रंटाइन की एक रिपोर्ट में पुलिस के हवाले से ईमेल का टाइटल बताया गया है राइज ऑफ जिहाद। इंडियन मुजाहदीन का नाम एकाएक सामने नहीं आया था। इसके पहले नवंबर 2007 में यूपी की अदालतों में हुए धमाकों और मई 2008 में जयपुर धमाकों की जिम्मेदारी भी आईएम ने ली थी। जयपुर में 15 मिनट में नौ धमाके हुए थे। कथित रूप से इंडियन मुजाहदीन के भेजे ईमेल में 2002 में हुए गुजरात दंगों की तस्वीरें थी। यह दावा भी किया गया कि गुजरात दंगों और बाबरी मस्जिद गिराए जाने का बदला है। अहमदाबाद ब्लास्ट से एक दिन पहले यानी 25 जुलाई को बेंगलुरु शहर में भी आठ धमाके हुए थे। जिसमें कम से कम एक व्यक्ति की जान गई। वहीं अहमदाबाद के अगले ही दिन यानी 27 जुलाई को सूरत में भी करीब 17 बम मिले। इसके अलावा सूरत में जिंदा मिलने का सिलसिला अगले कई दिन तक चलता रहा। लगभग 28 से 29 जिंदा बम बरामद किए गए।
फिर सितंबर 2008 में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी 45 मिनट के भीतर श्रृंखलाबद्ध विस्फोट हुए और कम से कम 20 लोग मारे गए। 2008 में भारत को कई आतंकी हमलों का सामना करना पड़ा। देश भर में छह बड़े बॉम्ब ब्लास्ट्स और कई छोटे-छोटे हमले और फिर नवंबर 2008 में हुआ मुंबई ट्रायल। हम लौटते हैं अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट्स केस पर। शुरुआत में 35 केस दर्ज किए गए। 20 अहमदाबाद और 15 सूरत में ट्रायल शुरू हुआ दिसंबर 2009 में।
आरोपितों को साबरमती सेंट्रल जेल में रखा गया था। वहीं केस की कार्यवाही चलती थी। इसलिए कि राज्य सरकार ने आरोपितों पर सीआरपीसी का सेक्शन 268 लगाया था। यह राज्य सरकार को अधिकार देता है कि खास कैदियों को उस जेल से बाहर ना जाने दें जहां उन्हें बंद रखा गया है। साल 2017 तक भारत के अलग-अलग राज्यों से 78 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया। उन पर तत्कालीन इंडियन पीनल कोड की अलग-अलग धाराओं के अलावा यूएपीए यानी अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट, प्रोविजंस ऑफ द आर्म्स एक्ट, एक्सप्लोसिव सब्सटेंसेस एक्ट और इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट के तहत केस हुआ। 2009 में ट्रायल शुरू होने और फरवरी 2022 में स्पेशल कोर्ट का फैसला आने तक नौ जजों ने इस केस को सुना।
पहली जज थी जस्टिस बेला त्रिवेदी। फरवरी 2010 में तत्कालीन स्पेशल जज बेला त्रिवेदी की ही कोर्ट थी जिसमें 65 आरोपितों पर चार्जेस फ्रेम किए गए और आखिरी थे निर्णय सुनाने वाले जज अंबालाल पटेल। फरवरी 2022 स्पेशल कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला। स्पेशल जज अंबालाल आर पटेल ने 8 फरवरी 2022 को कन्विक्शन ऑर्डर दिया। शुरुआत में कुल 78 अभियुक्त थे। इनमें से इनमें से अय्यास सैयद सरकारी गवाह बन गया। बाकी के 77 अभियुक्तों पर ट्रायल सितंबर 2021 में पूरा हुआ।
इनमें से 49 को दोषी पाया गया और बाकी 28 को बरी कर दिया गया। जिन्हें दोषी पाया गया उन पर मर्डर, राजद्रोह और स्टेट के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप थे। जज अंबालाल पटेल ने केस को रेिस्ट ऑफ द रेयर बताते हुए 18 फरवरी 2022 को सजा सुनाई। 7000 से ज्यादा पन्नों का निर्णय।
38 दोषियों को फांसी और 11 को उनकी मौत तक जेल में रखने की सजा। 48 दोषियों पर ₹85,000 प्रति व्यक्ति जुर्माना भी लगाया गया। कोर्ट ने कहा कि यह पैसा धमाकों में मारे गए 56 लोगों के परिवारों को मुआवजा देने में खर्च होगा। सजा पाने वालों में मुख्य साजिशकर्ता सफदर नागरी, कमरुद्दीन नागरी, कयामुद्दीन कपाडिया, जाहिद शेख और शमशुद्दीन शेख के नाम शामिल हैं। यह फैसला दुर्लभ था क्योंकि इस केस में एक साथ जितने लोगों को फांसी की सजा मिली है, वह अब तक की सबसे ज्यादा है।
इससे पहले एक सिंगल केस के भीतर बड़ी संख्या में लोगों को फांसी सुनाने का मामला 1998 का है। जब एक टाटा कोर्ट ने 26 लोगों को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की की साजिश में शामिल होने का दोषी माना और सभी को की सजा सुनाई। हालांकि किसी को भी नहीं दी गई क्योंकि ऊपरी अदालतों ने निर्णय की समीक्षा करते हुए सजा में बदलाव किए। अब गुजरात उच्च न्यायालय का निर्णय। अब हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच जस्टिस अल्पेश वाई कोकजे और जस्टिस समीर जे दवे ने स्पेशल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।
दोषियों को आईपीसी, यूएपीए, एक्सप्लोसिव सब्सटेंसेस एक्ट और अन्य कानूनों के प्रावधानों के तहत सजा दी गई। अदालत ने प्रदेश सरकार को मुआवजे के भुगतान का भी आदेश दिया है। के परिवार को ₹1 लाख, गंभीर रूप से घायल हुए व्यक्तियों के लिए ₹5 लाख और सामान्य चोट के लिए ₹1 लाख, भुगतान की अधिकतम समय सीमा 31 मार्च 2027। कोर्ट के इस फैसले के बारे