अब अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट के हाथ में है। सुप्रीम कोर्ट ये तय करेगा कि मद्रास हाईकोर्ट का आदेश कानून के दायरे में था या नहीं। लेकिन अदालत के फैसले से पहले ही ये मामला तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़े विमर्श का केंद्र बन चुका है।
क्या विजय सरकार कानून की रक्षा कर रही है? क्या यह द्रविडियन राजनीति की नई परिभाषा गढ़ रही है? या फिर डीएमके और टीवी के बीच वैचारिक वर्चस्व की लड़ाई जो है वो शुरू हो चुकी है। इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में तमिलनाडु की राजनीति की दिशा भी तय कर सकती है। तमिलनाडु में पर घमासान। मुख्यमंत्री विजय की सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची। मद्रास हाईकोर्ट ने कहा था कि राज्य में किसी भी दिन गौ हत्या नहीं होनी चाहिए। अब सवाल ये कि क्या विजय सरकार कानून की लड़ाई लड़ रही है या फिर इसके पीछे छिपी है तमिलनाडु की सबसे बड़ी राजनीतिक रणनीति? नमस्कार, मैं हूं पिंकी राजपुरोहित।
तमिलनाडु की राजनीति में एक ऐसा विवाद खड़ा हो गया है जो सिर्फ अदालत तक सीमित नहीं है। यह मामला कानून, आस्था और राजनीति और विचारधारा चारों के संगम पर खड़ा दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री विजय की सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। जिसमें राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने को निर्देश दिया था कि तमिलनाडु में किसी भी दिन गौ हत्या ना हो। लेकिन सवाल सिर्फ इतना ही नहीं है।
सवाल यह है कि क्या विजय सरकार सिर्फ कानूनी व्यवस्था का विरोध कर रही है या फिर यह कदम तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़े वैचारिक संघर्ष का हिस्सा माना जा रहा है। आइए समझते हैं पूरा मामला। मामले की शुरुआत होती है याचिका से जिसमें बकरी ईद के दौरान कोयंबूर में सार्वजनिक स्थानों पर कथित रूप से हो रही गौ हत्या और पशु कटाई पर रोक लगाने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए कहा कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित करें कि तमिलनाडु में किसी भी दिन गाय और बछड़ों की ना की जाए।
यानी अदालत का आदेश सिर्फ बकरी ईद या किसी एक दिन तक सीमित नहीं था बल्कि पूरे राज्य में हर दिन के लिए लागू होने वाला यह निर्देश बन गया। यहीं से विवाद शुरू होता है। तमिलनाडु सरकार का कहना है कि हाईकोर्ट अपने अधिकार क्षेत्र से आगे निकल गया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि राज्य में पहले से ही तमिलनाडु एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट 1958 लागू है। इस कानून के तहत 10 साल से अधिक उम्र की ऐसी गाय जो काम करने या प्रजनन के योग्य नहीं रही।
निर्धारित प्रक्रिया और प्रमाणन के बाद उसके की अनुमति दी जा सकती है। तो सरकार का यह तर्क है कि जब कानून कुछ परिस्थितियों में अनुमति देता है तब अदालत पूर्ण प्रतिबंध जैसा आदेश नहीं दे सकती। यानी सरकार की दलील है कि हाईकोर्ट ने कानून की सीमाओं से आगे जाकर फैसला दिया है। क्या गौ हत्या पर प्रतिबंध असंवैधानिक है? तो इस सवाल का जवाब साफ है कि नहीं? क्योंकि देश के कई ऐसे राज्य हैं।
जहां पर गौ हत्या पर सख्त प्रतिबंध लागू है। सुप्रीम कोर्ट ने भी 1958 के चर्चित मोहम्मद हनीफ कुरैशी बनाम बिहार राज्य के मामले में कानूनों को असंवैधानिक माना था और उसके बाद 2005 में भी सर्वोच्च अदालत ने अपने पुराने फैसले को ही सही ठहराया था।
यानी कानूनी रूप से पर प्रतिबंध कोई असंवैधानिक व्यवस्था नहीं मानी जा सकती। लेकिन यहां विवाद प्रतिबंध को लेकर नहीं बल्कि अदालत द्वारा दिए गए आदेश की सीमा और वैधानिकता को लेकर है। तमिलनाडु को अक्सर सिर्फ द्रविडियन राजनीति और परिहारवादी विचारधारा के चश्मे से देखा जाता है।
लेकिन ग्रामीण तमिलनाडु की तस्वीर कुछ और ही कहती है। हां, यह सच है कि राज्य में बड़ी आबादी मांसाहारी है। लेकिन गाय और बैलों के प्रति सम्मान और भावनात्मक लगाव भी उतना ही ज्यादा गहरा है। ज्लीकट्टू आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब ज्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगा था तब लाखों लोग सड़कों पर उतर आए थे। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उनके बैल परिवार के सदस्य हैं। तमिल संस्कृति में पशुधन सिर्फ आर्थिक संसाधन नहीं बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी माना जाता है।
अब राजनीतिक की बात यह है कि यह मामला सबसे दिलचस्प हो जाता है। विजय सरकार ने सत्ता संभालने के बाद कम समय में मद्रास हाईकोर्ट के दो ऐसे फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जो कि हिंदू संगठनों द्वारा दायर किए गए थे। पहला मामला त्रिपुर कुंद्रम मुरगन मंदिर में दीप जलाने को लेकर और दूसरा गौ हत्या से संबंधित आदेश। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ एक कानूनी लड़ाई नहीं है बल्कि इसके पीछे तमिलनाडु की राजनीति में वैचारिक वर्चस्व की लड़ाई भी छिपी हो सकती है।
क्या डीएमके की जमीन पर कब्जा की कोशिश है? विजय ने अपनी पार्टी के वैचारिक स्तंभों में पेरियार को सबसे प्रमुख स्थान दिया है। दूसरी तरफ डीएमके लंबे समय से खुद को पेरियारवादी राजनीति का सबसे बड़ा प्रतिनिधि बताती आई है।
ऐसे में राजनीतिक जानकार यह मानते हैं कि टीवी की रणनीति सिर्फ डीएमके का विरोध करना नहीं बल्कि उसकी वैचारिक जमीन पर भी दावा ठोकना है। भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था, प्रशासनिक मुद्दों पर भी डीएमके को घेरना एक अलग रणनीति है।
लेकिन वैचारिक मोर्चों पर भी खुद को मजबूत दिखाना टीवी के लिए उतना ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसलिए कुछ लोग इस कानूनी लड़ाई को राजनीतिक संदेश के रूप में ज्यादा देख रहे हैं।
अब अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट के हाथ में है। सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि मद्रास हाईकोर्ट का आदेश कानून के दायरे में था या नहीं। लेकिन अदालत के फैसले से पहले ही मामला तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़े विमर्श का केंद्र बन चुका है। क्या विजय की सरकार कानून की रक्षा कर रही है?