अगर मैं आपसे कहूं कि दुनिया में एक ऐसा आइलैंड भी है जो हर दिन करोड़ों रुपए का सोना पैदा करता है तो क्या आप यकीन करेंगे? साथियों यह कोई कहानी नहीं बल्कि हकीकत है। अंटार्कटिका में मौजूद माउंट एरेबस साउथ पोल का सबसे ज्यादा एक्टिव ज्वालामुखी है। लेकिन इसे खास बनाती है इसकी एक ऐसी स्पेशल खूबी जो दुनिया के किसी और ज्वालामुखी में नहीं देखी गई है। आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला। नमस्कार, मैं हूं आदित्य india.com में आपका स्वागत है। दरअसल, माउंट एरेबस में मौजूद यह ज्वालामुखी हर दिन लगभग 80 ग्राम शुद्ध सोने के बेहद छोटे-छोटे क्रिस्टल हवा में रिलीज करता है।
आज के सोने के दाम के हिसाब से उनकी कीमत करीब ₹1 लाख रोजाना और 43 करोड़ 80 लाख सालाना से भी ज्यादा बैठती है। लेकिन अगर इतना सोना निकलता है तो कोई आम आदमी इसे इकट्ठा क्यों नहीं करता? साथियों, इसका उत्तर यह है क्योंकि यह सोना किसी सिक्के या गहने के रूप में नहीं निकलता। यह इतने छोटे-छोटे माइक्रोस्कोपिक गोल्ड क्रिस्टल होते हैं कि इन्हें देखने के लिए इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की जरूरत पड़ती है। इनका आकार सिर्फ 60 माइक्रो मीटर तक होता है। यानी इंसान के बाल से भी ज्यादा पतला। वैज्ञानिकों ने पाया है कि ज्वालामुखी की लावा झील से निकलने वाली गर्म गैसें इन सोने के कणों को अपने साथ ऊपर ले जाती है। यह कण हवा में 1000 कि.मी. तक सफर कर सकते हैं
और फिर अंटार्कटिका की बर्फ पर जाकर गिरते हैं। दिलचस्प बात यह है कि मॉट किला येवा, मॉन्ट एटना, ऑगस्टिन ज्वालामुखी और एल चिचचोन जैसे दूसरे ज्वालामुखियों में भी थोड़ी मात्रा में सोना मिला है। लेकिन मॉनट इरेबस्ट जैसा मामला आज तक कहीं और देखने को नहीं मिला है। सवाल अब यह है कि आखिर यह सोना बनता कैसे है? वैज्ञानिकों के पास दो थ्योरी हैं। पहली कि ज्वालामुखी से निकलने वाले क्लोरीन गैसें ठंडी होकर सीधे सोने के क्रिस्टल बना देती हैं। दूसरी यह कि क्रिस्टल पहले लावा झील की सतह पर बनते हैं और फिर गैसों के साथ हवा में उड़ जाते हैं। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस खोज के 30 साल से ज्यादा हो जाने के बावजूद भी वैज्ञानिक आज प्रमाणिक तौर पर इसे नहीं समझ पाए हैं। यानी अंटार्कटिका की बर्फ के बीच खड़ा यह ज्वालामुखी आज भी विज्ञान की सबसे बड़ी पहेलियों में से एक बना हुआ है। अब एक और सवाल उठता है कि अंटार्कटिका का यह सोना जाता किसके पास है? तो इसका उत्तर यह है कि फिलहाल कोई भी देश इस सोने का खनन नहीं कर रहा है।
अंटार्कटिक संधि और इसके पर्यावरण प्रोटोकॉल के तहत यहां पर किसी भी तरह का खनन अनिश्चितकाल के लिए कानूनी रूप से प्रतिबंधित है। यह प्रतिबंध शांतिपूर्ण और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए इस क्षेत्र की रक्षा करता है। हालांकि 2048 में इसकी समीक्षा की जाएगी। दक्षिण एशिया के लिहाज से देखें तो भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों की ओर से अंटार्कटिका को लेकर खास मिशन एक्टिव मोड में जारी है। अंटार्कटिका में पाकिस्तान का मिशन पाकिस्तान अंटार्कटिक कार्यक्रम के रूप में जाना जाता है। इस मिशन का संचालन विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान द्वारा किया जाता है। जनवरी 1991 में अपने पहले अभियान के साथ पाकिस्तान अंटार्कटिका में शोध केंद्र स्थापित करने वाला पहला मुस्लिम देश बना था। पाकिस्तान अंटार्कटिका में दो अनमैंड मौसम और शोध केंद्र संचालित करता है।
जिसके नाम जिन्ना अंटार्कटिक स्टेशन वन और टू हैं। साथियों भारत की बात करें तो अंटार्कटिका में इंडियन अंटार्कटिक प्रोग्राम की शुरुआत 1981 में हुई। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत संचालित इस मिशन का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन, भूविज्ञान और खगोल विज्ञान का अध्ययन करना है। भारत ने अंटार्कटिका में अपने तीन प्रमुख अनुसंधान केंद्र स्थापित किए हैं। दक्षिण गंगोत्री, मैत्री और भारती। वर्तमान में मैत्री और भारतीय सक्रिय है और भारत 2029 तक अपना चौथा एक्स्ट्रा मॉडर्न स्टेशन मैत्री 2 भी तैयार कर रहा है। 2048 के बाद अगर वहां माइनिंग को खोला जाता है तो लाजमी है कि सभी देशों के बीच इसकी होड़ शुरू हो सकती है। साथियों अंटार्कटिका के ज्वालामुखी से निकलने वाले गोल्ड को लेकर यह थी हमारी खास पेशकश। इसको लेकर आप क्या सोचते हैं? कमेंट करके हमें जरूर बताएं। बने रहिए india.com के साथ। शुक्रिया।