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क्यों जिंदा कं!का!ल बन गई थी मधुबाला?मौ!त की सबसे दर्दनाक कहानी जानकर रोंगटे खड़े हो जाएंगे

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जब भी बात होती है हिंदी सिनेमा के सबसे खूबसूरत अदाकारा की तो जहन में एक ही नाम उभरता है। वो नाम जिसे जमाने ने फिल्मों की मल्लिका कहकर याद किया कि जब वो पान खाती थी तो यूं लगता था जैसे लाल रंग उनके गले से उतरता हुआ दिखाई दे रहा हो।

वो अदाकारा जिनके सामने राज कपूर जैसे कद्दावर फनकार भी अपनी लाइंस भूल जाते थे और जिनके लिए अमेरिका की मशहूर मैगजीन थिएटर आर्ट्स ने लिखा था द बिगेस्ट स्टार इन द वर्ल्ड। एक ऐसी कलाकार जिसने पूरे दौर के दिलों पर हुकूमत की मगर जिंदगी के आखिरी 9 साल बिस्तर पर गुजार दिए। जिस खूबसूरती की मिसाल लोग चांद से देते थे, वीनस से देते थे, वही चेहरा धीरे-धीरे हड्डियों के एक ढांचे में तब्दील होने लगा। मधुबाला, जिनका नाम ही खूबसूरती का पैमाना था अब आईने में खुद को देखकर सहम जाती थी।

अपनी बहन शहीदा से बस एक ही बात दोहराती। अल्लाह मैं मरना नहीं चाहती। इस पन्ने पर कहानी उस अदाकारा की जो महज 14 साल की उम्र में बतौर एक्ट्रेस पर्दे पर नमूदार हुई जिसकी खूबसूरती के फसाने सरहदों के पार तक गए। यहां तक कि जुल्फिकार अली भुट्टो ने भी उनसे निकाह की ख्वाहिश जताई जो रियल लाइफ में अनारकली बनी और रियल लाइफ में भी उसी किरदार की तकदीर अपने हिस्से लिखवा बैठी।

जिन्हें कभी फिल्म हिट करने की गारंटी कहा गया तो कभी बॉक्स ऑफिस पोइजन का नाम दिया गया। मधुबाला का जन्म 14 फरवरी 1933 को हुआ यानी वैलेंटाइन डे के दिन और शहर था दिलवालों की दिल्ली। उनका असली नाम था मुमताज जहान बेगम। पिता का नाम था अताउल्लाह खान और मां थी आयशा बेगम।

आयशा बेगम का रिश्ता दिल्ली से था। जबकि अताउल्लाह खान उस दौर की ओल्ड पेशावर वैली से ताल्लुक रखते थे जो कि अब पाकिस्तान में हैं। उन्हीं दिनों उनकी मुलाकात एक नजुमी से हुई जिसे लोग कश्मीरी वाले बाबा के नाम से जानते थे। उस नजूमी यानी हाथ देखने वाले एस्ट्रोलॉजर ने अताउल्लाह से कहा कि तेरी लड़की बहुत दौलत और शहरत पाएगी। देश विदेश में इसका नाम होगा। मुमताज जहान दहलवी एक नायाब हीरा है। मगर इसकी जिंदगी बहुत छोटी होगी।

वक्त गुजरा और वो बात सच होती नजर आई। एक दिन मधुबाला को दिल्ली आकाशवाणी केंद्र जाने का मौका मिला। वहां बच्चों का एक कार्यक्रम होता था। नाम था निशाना और श्रृंगार जिसे संगीतकार खुर्शीद अनवर पेश करते थे। उसी दिन मधुबाला का भी कार्यक्रम तय था। उसी दौरान संगीतकार मदन मोहन के पिता राय बहादुर चुन्नीलाल भी दिल्ली आए हुए थे। उन्होंने इस नन्ही सी बच्ची को मंच पर देखा और देखते ही रह गए।

राय बहादुर चुन्नी लाल उस वक्त बॉम्बे टॉकीज़ के जनरल मैनेजर थे। उन्हीं दिनों फिल्म बसंत की तैयारी भी चल रही थी। जिसमें अभिनेता उल्लास और मुमताज शांति मुख्य भूमिका में थे। फिल्म के लिए एक छोटी लड़की की तलाश थी चाइल्ड आर्टिस्ट के लिए। चुन्नी लाल मधुबाला को सीधे बॉम्बे टॉकीज़ की मालकिन देविका रानी के पास ले गए। देविका रानी ने जैसे ही मधुबाला को देखा वो प्रभावित हुए बिना रह ही नहीं सकी और यहीं से मधुबाला को उनकी पहली फिल्म मिल गई। साल था 1942। फिल्म थी बसंत।

फिल्म में मधुबाला ने एक ऐसी बच्चे का किरदार निभाया जो अपने बिछड़े हुए मां-बाप को फिर से मिलाने की कोशिश करती है। यह फिल्म सिर्फ पर्दे पर ही नहीं बल्कि उनके घर में भी बसंत लेकर आई। उस दौर में ₹150 महीना मिलना भी किसी चमत्कार से कम नहीं था और घर में खुशियों की बहार आ गई। अब अताउल्लाह खान को यकीन हो गया कि रास्ता दिल्ली से आगे जाता है। वह पूरे परिवार के साथ मुंबई आ गया और माया नगरी में कदम रखते ही भिवंडी की एक छोटी सी जगह पर रहने लगी। कहानियों के सिलसिले में एक किस्सा उनके पहले प्यार का भी आता है।

एक नाम लतीफ बचपन के दिनों का साथ दिल्ली की गलियों का रिश्ता उसी शहर में जहां से मधुबाला अपने परिवार के साथ मुंबई के लिए रवाना हो गई थी। कहानी यह है कि उनके जाने के बाद लतीफ बहुत टूट गए थे। जाने से पहले मधुबाला ने उन्हें एक लाल गुलाब दिया था अपनी आखिरी मुलाकात पर एक निशानी के तौर पर। यही गुलाब उनके पास हमेशा रहा और वही उनके बीच की आखिरी निशानी थी। दैनिक भास्कर में छपे एक लेख में इस किस्से का जिक्र मिलता है कि लतीफ ने उस गुलाब को बहुत सालों तक संभाल कर रखा।

वक्त गुजरता गया जिंदगी अपने रास्ते पर चलती रही मगर वह गुलाब वहीं रहा। जब मधुबाला इस दुनिया में नहीं रही। तब लतीफ ने वह गुलाब उनकी कब्र पर रख दिया। बताया जाता है कि लतीफ आगे चलकर एक आईएएस अधिकारी बने और हर साल 23 फरवरी को वह उनकी कब्र पर जाते हैं और एक गुलाब चढ़ाते थे। खतीजा अकबर अपनी किताब आई वांट टू लिव में एक किस्से का जिक्र करती हैं। एक दिन रंजीत स्टूडियो के बाहर अभिनेता मोतीलाल की नजर मधुबाला पर पड़ी।

उन्होंने रंजीत स्टूडियो के संगीत साजिंदे यानी म्यूजिशियन से मधुबाला का इंटरव्यू करवाया। पूछा गया गाना आता है। मधुबाला ने कहा हां आता है। उन्होंने गाना शुरू किया। कमरे में बैठे लोग सुनते रहे। कुछ देर बाद मधुबाला अचानक रुक गई। साजिंदों को लगा कि शायद वह रुक गई हैं या घबरा गई हैं। तबले की लय और उनकी आवाज एक साथ नहीं चल रही तबलची अपनी तरफ से कोशिश कर रहा था। मधुबाला ने उसे रोका और कहा मैं जैसा गाती हूं वैसी ही ताल आपको मिलानी पड़ेगी। मैं आपके तबले के हिसाब से अपनी ताल नहीं बदलूंगी। इसके बाद फिर से गाना शुरू हुआ। कुछ ही समय में उन्हें रणजी स्टूडियो में काम मिल गया। ₹300 महीने की नौकरी उस दौर में यही उनके घर की पहली स्थिर आमदनी बनी।

साल 1944 में मुमताज महल आई। फिर 1945 में धन्ना भगत 1946 में एक के बाद एक कई फिल्में आई। पुजारी, फुलवारी और राजपूतानी इनमें फुलवारी उस साल की तीसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी। इन सभी फिल्मों में मधुबाला बाल कलाकार के तौर पर काम कर रही थी। बाल कलाकार के तौर पर उनकी आखिरी फिल्म की बात करें तो वह राजपूतानी थी। इसी दौर में मधुबाला की मुलाकात एक और चाइल्ड आर्टिस्ट से हुई थी। बेबी मेहजबीन से वो बेबी मेहजबीन जो आगे चलकर मीना कुमारी कहलाई।

एक बातचीत में मधुबाला ने कहा था कि उनकी आवाज अलग है। ऐसी जो किसी और के पास नहीं। मंजू गुप्ता अपनी किताब मधुबाला में एक वाक्या दर्ज करती है। 1944 में बॉम्बे के डॉग्स में एक बड़ा धमाका हुआ था। उस हादसे में मधुबाला का घर भी तबाह हो गया था। परिवार एक बार फिर से सड़क पर आ गया था और हालात ऐसे बन गए थे कि उन्हें वापस दिल्ली लौटना पड़ा था। दिल्ली लौटना एक मजबूरी की तरह था। ठहराव नहीं था। इसी दौरान एक और घटना होती है। बॉम्बे टॉकीज़ की मालकिन देविका रानी को जब यह खबर मिली तो उन्होंने मुमताज को वापस बुलाने का फैसला किया। उन्होंने एक डायरेक्टर को दिल्ली भेजा सिर्फ इसलिए कि मुमताज को फिर से बॉम्बे लाया जा सके। इरादा था कि उन्हें अपनी फिल्म ज्वार भाटा में एक किरदार देंगी। हालांकि तब अपने पिता के दबाव में आकर मधुबाला ने यह फिल्म नहीं की थी क्योंकि अताउल्लाह खान मधुबाला को बिना उनकी निगरानी के कहीं भेजना नहीं चाहते थे।

खैर उस फिल्म के लिए नहीं मगर आगे चलकर बेबी मुमताज यानी मधुबाला मुंबई लौटी अपने परिवार के साथ काम मिलता गया और अताउल्लाह खान ने पूरी तरह जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली वही मधुबाला के मैनेजर थे वही फैसले लेते थे इसी दौरान फिल्म नीलकमल की तैयारियां शुरू हुई ओरिएंटल फिल्म कंपनी अपनी पहली फिल्म बना रही थी इस फिल्म से जुड़ा एक वाक्या निर्देशक और गीतकार केदार शर्मा के इंटरव्यूज और उनके लिखे संस्मरणों में दर्ज है। किस्सा यह है कि फिल्म की मुख्य अभिनेत्री कमला चैटर्जी बीमार पड़ गई थी और उन्होंने केदार शर्मा से यह आग्रह किया था कि उनकी जगह मधुबाला को लिया जाए।

केदार शर्मा ने इस बात को स्वीकार किया। जब यह निर्णय रंजी स्टूडियो तक पहुंचा तो वहां के मालिक चंदूलाल शाह ने इस पर अपनी आपत्ति जताई। उन्हें लगा कि 14 साल की लड़की को मुख्य भूमिका देना सही नहीं होगा। इस बात पर मतभेद इतना बढ़ गया कि केदार शर्मा ने अलग रास्ता ही चुन लिया। केदार शर्मा लिखते हैं कि उन्होंने अपनी निजी चीजें गिरवी रखकर रकम चुकाई और फिल्म को अपने तरीके से पूरा किया। साल 1947 में नीलकमल रिलीज हुई। इसी फिल्म के साथ मधुबाला पहली बार लीड रोल में सामने आई। उनके साथ थे राज कपूर। उनके लिए भी यह शुरुआती फिल्मों में से एक ही थी। नीलकमल की शूटिंग से जुड़े अनुभव खुद केदार शर्मा ने कई जगह साझा किए हैं। वे बताते हैं कि मधुबाला समय की पाबंद थी। अक्सर तय समय से पहले सेट पर पहुंच जाती थी।

काम के दौरान पूरा ध्यान रखती थी और बिना रुके शूटिंग करती थी। उन्होंने यह भी लिखा कि मधुबाला के काम करने के तरीके और उनके अनुशासन ने उन्हें प्रभावित किया था। मधुबाला मशीन की तरह काम करती रही। बिना रुके बिना थके कभी सेट पर खाना खाने से चूक जाती तो कभी मलाड से दादा थर्ड क्लास के डिब्बे में बैठकर आती। लेकिन कभी भी लेट नहीं होती। ना ही कभी एब्सेंट होती। इतनी सी कम उम्र में उन्होंने परिवार के पूरे कर्तव्य निभाए और एक आज्ञाकारी बेटी बनी। अपनी पहली फिल्म के बाद मधुबाला ने राज कपूर के साथ लगातार काम किया।

चित्तौड़ विजय, दिल की रानी, अमर प्रेम और दो उस्ताद जैसी फिल्में की। पर्दे पर उनकी मौजूदगी नोटिस की जाने लगी। उस दौर में समीक्षकों की राय ही फिल्मों की दिशा तय करती थी और कई आलोचकों ने उनके काम को सराहा। लेकिन कैमरे के पीछे एक अलग कहानी चल रही थी। मधुबाला मस्ती एंड मैजिक में अल्पना चौधरी लिखती हैं। अताउल्लाह खान हर वक्त साथ रहते थे। घर से स्टूडियो तक स्टूडियो से घर तक का पूरा सिलसिला वही तय करते थे। मिलने वालों पर रोक थी।

सेट पर भी आने जाने वालों की जांच होती थी। मधुबाला के लिए काम के अलावा और कोई जगह नहीं बचती थी। दोस्ती, मुलाकातें यह सब धीरे-धीरे सीमित होता गया। फिल्मों का चुनाव भी अताउल्लाह खान ही करते थे। ध्यान ज्यादातर काम मिलने पर होता था। किरदार पर या कहानी पर नहीं। जो फिल्म मिलती उसे स्वीकार कर लिया जाता। इसी सिलसिले में 1939 में एक फिल्म का प्रस्ताव आया।

नाम था मधुबाला जिसमें उनके साथ देवानंद थे। यह वही निर्माता थे जिन्होंने एक वक्त पर उनकी मां के इलाज के लिए आर्थिक मदद की थी। मधुबाला ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया। दूसरे काम छोड़े। यहां तक कि एक फिल्म का एडवांस भी लौटा दिया। साल 1950 में रिलीज हुई यह फिल्म लेकिन फिल्म बहुत ज्यादा चली नहीं। उस दौर की समीक्षकों ने भी इस फिल्म पर कई टिप्पणी की। कुछ अखबारों में लिखा गया कि इस प्रोड्यूसर ने कई कलाकारों के करियर खत्म किए हैं और इस फिल्म की तकनीकी कमियों ने कलाकार के काम को ढक दिया है। मधुबाला का नाम भी उस सूची में शामिल कर दिया गया। अगले 2 सालों में उन्होंने करीब दो दर्जन फिल्में साइन की। ज्यादातर फिल्में सफल नहीं रही। मीडिया का रुख बदलने लगा। जिन पन्नों पर पहले तारीफ लिखी जाती थी। वहीं अब एक नया शब्द दिखने लगा। अनलकी। कुछ रिपोर्ट्स में उन्हें बॉक्स ऑफिस पोइजन तक कहा गया। यानी एक ऐसी कलाकार जिनकी मौजूदगी को फिल्म की असफलता से जोड़ा जाने लगा। इस दौर में उन्हें उबारा महल नाम की फिल्म ने। 1949 महल रिलीज होती है और इसी एक फिल्म ने कहानी की दिशा बदल दी। महल का किरदार अलग था। डायलॉग कम थे और चेहरे के भाव ज्यादा थे। कैमरा ठहरता था और मधुबाला का चेहरा बोलता था।

उसी दौरान एक और वाक्या सामने आता है फिल्म के चुनाव का। जब कमाल अम्रोवी ने इस फिल्म के लिए मधुबाला का नाम लिया तो स्टूडियो मैनेजमेंट तैयार नहीं हुई। पिछली फिल्मों के नतीजे की वजह से उन्हें जोखिम लगता था। स्क्रीन टेस्ट की बात आई तो सिनेमेटोग्राफर को कहा गया कि टेस्ट ऐसा हो जिससे उन्हें आसानी से मना किया जा सके। स्क्रीन टेस्ट हुआ लेकिन बात वहीं खत्म नहीं हुई। कमाल अमरोवी ने खुद लाइट सेट की, फ्रेम तय किया और एक टेस्ट करवाया। जब नई फुटेज सामने आई तो फैसला बदल गया।

वही चेहरा जिसे पहले रिजेक्ट करने की तैयारी थी। अब फिल्म का हिस्सा बन चुका था। फिल्म रिलीज हुई और उसके साथ एक गीत भी लोगों के दिलों तक पहुंचा। आ जाएगा आने वाला जिसे लता मंगेशकर ने आवाज दी थी। यह गीत रेडियो पर बार-बार बजने लगा और फिल्म के साथ-साथ उसकी गूंज भी फैलती गई। महल फिल्म की शूटिंग के दौरान एक और रिश्ता बन गया था।

मधुबाला और कमाल अमरोविका एक दूसरे के करीब आ रहे थे दोनों। यह बात अताउल्लाह खान को भी मालूम थी और उन्हें इस रिश्ते पर ऐतराज भी नहीं था। लेकिन कमाल अमरोवी पहले से शादीशुदा थे। दोनों का रिश्ता बहुत आगे बढ़ नहीं सका।

।इसी दौर में मधुबाला ने अपने लिए कुछ छोटे-छोटे फैसले भी लेने शुरू किए। वो अंग्रेजी सीखने लगी। ड्राइविंग सीखने लगी। सेट के बाहर भी अपने लिए थोड़ी जगह बनाने की कोशिश करने लगी। महल के बाद नाम भी बदल गया। मुमताज जहान दहलवी अब मधुआला बन चुकी थी। और यह नाम सिर्फ पोस्टरों पर नहीं लोगों की याद में बस गया। इसके बाद फिल्मों का सिलसिला फिर तेज हुआ। दौलत अपराधी परदेश निशाना हस्ते आंसू बेकसूर तराना नादान बादल फिर आगे साकी संगदिल रेल का डिब्बा अरमान काम चलता रहा और हर फिल्म के साथ उनका नाम और पुख्ता होता रहा।

मधुबाला की फिल्मी करियर में एक नया किस्सा लेकर आई फिल्म हंसते आंसू। भारतीय सिनेमा के इतिहास में यह पहली फिल्म बनी जिसे सेंसर बोर्ड ने ए सर्टिफिकेट दिया। यानी इसे एडल्ट फिल्म माना गया। मधुबाला लीड रोल में थी लेकिन वह खुद उस वक्त पर यह फिल्म नहीं देख सकी क्योंकि उनकी उम्र ही महज 17 साल थी। ए रेटेड होने की वजह से यह फिल्म 18 साल से कम उम्र के बच्चे नहीं देख सकते थे।

भाईचंद पटेल द्वारा संपादित किताब बॉलीवुड टॉप 20 सुपरस्टार्स ऑफ इंडिया में एक किस्सा मिलता है। कहते हैं कि एक दिन बाला साहेब ठाकरे ने मधुबाला को देखा फिल्म की शूटिंग के दौरान और देखते ही उनके मुंह से निकला कि आज तो दिन बन गया। वो मधुबाला की खूबसूरती से इस तरह कायल हुए। एक और ऐसा ही किस्सा आता है फिल्म साकी के सेट से। उस दौरान मधुबाला को डांस सिखा रहे थे मशहूर मास्टर गोपी कृष्णा।

रिहर्सल के बीच एक ब्रेक हुआ और मधुबाला ने उन्हें नाश्ते के लिए साथ बैठने को कहा। दोनों बैठे सामने खाना रखा गया। गोपी कृष्ण मधुबाला को देखते हुए खाने लगे। देखने में इतना खो गए कि उन्हें पता ही नहीं चला कि प्लेट में नॉनवेज परोसा गया है जिसे वह खा रहे हैं। खाना खत्म होने पर सेट पर बात छिड़ी। तब गोपाल कृष्ण को पता चला कि उन्होंने नॉनवेज खा लिया और एहसास भी नहीं हुआ। एक किस्सा सरहद के उस पार से भी जुड़ता है। नाम है जुल्फिकार अली भुट्टो जिन्हें आगे चलकर पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनना था।

वह मुंबई में कानून की पढ़ाई कर रहे थे। वर्ली सी फेस पर उनके परिवार की एक कोठी थी और कुछ साल वो वहीं ठहरे थे। उसी समय मुंबई में मुगले आजम की शूटिंग चल रही थी। संगीतकार नौशाद अपने एक बयान में उस दौर को याद करते हैं। वह बताते हैं कि जब मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गए और रेव गीत की शूटिंग हो रही थी तब भुट्टो अक्सर सेट पर जाया करते थे। उनका आना लगभग रोज का सिलसिला बन गया था।

एक दिन लंच ब्रेक के दौरान भुट्टो ने मधुबाला के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया। लेकिन मधुबाला ने हंसकर बात टाल दी। इट्स अ वंडरफुल लाइफ जैसी मशहूर फिल्म बनाने वाले हॉलीवुड डायरेक्टर फ्रांस कापरा एक बार भारत आए थे। मुंबई में फिल्मी दुनिया के लोगों से मिले। बोले कि अगर मौका मिले तो वह मधुबाला के लिए हॉलीवुड में काम का रास्ता खोल सकते हैं। इस पेशकश का जिक्र फिल्म पत्रकार बी के करंजिया अपनी आत्मकथा काउंटिंग माय ब्लेसिंग्स में करते हैं। वह लिखते हैं कि जब उन्होंने यह बात अताउल्लाह खान तक पहुंचाई। अताउल्लाह खान ने इस प्रस्ताव को टुकरा दिया। वजह भी उन्होंने साफ शब्दों में बताई।

उन्होंने कहा था कि मधुबाला को छुरी और कांटे से खाने नहीं आता है। वह विदेश नहीं जाएंगी। साल 1954 में फिल्म बहुत दिन हुए कि शूटिंग चल रही थी। एक दिन शूटिंग के बीच मधुबाला को अचानक की उल्टी हुई। डॉक्टर्स ने जांच के बाद बताया कि मधुबाला को एक जन्मजात दिल की बीमारी है जिसे मेडिकल भाषा में कहा जाता है और आमतौर पर इसे हम दिल का छेद कहते हैं। इस वजह से का बहाव सही तरीके से हो नहीं पाता। फेफड़ों पर असर पड़ता है और सांस लेने में दिक्कत होती है। इस घटना के बाद भी शूटिंग रुकती नहीं है। मधुबाला सेट पर आती रहती हैं और काम करती रहती हैं। फिल्म तराना के सेट पर मधुबाला की कहानी को नया मोड़ मिलता है। यहीं पहली बार मधुबाला और दिलीप कुमार आमने-सामने आते हैं। शूटिंग चल रही होती है और उसी के साथ मुलाकातें भी बढ़ने लगती हैं। सीन के बीच ब्रेक के दौरान बातें होने लगती हैं।

एक दिन मधुबाला ने दिलीप कुमार के लिए गुलाब भिजवाया। उसके साथ एक पर्ची थी। उस पर लिखा था अगर आपको मुझसे मोहब्बत का इकरार हो तो इन गुलाबों को कबूल कर लीजिए। गुलाब पहुंचा जवाब भी आया शब्दों में नहीं उसी मुस्कान में। इसके बाद एक सिलसिला बना। कई बार ऐसा होता कि दिलीप कुमार अपनी शूटिंग से वक्त निकालकर सीधे उनके सेट पर पहुंच जाते जहां मधुबाला काम कर रही होती।

हालांकि उनके पिता अताउल्लाह खान की वजह से मधुबाला का दिलीप कुमार से मिल पाना आसान नहीं था। मुलाकात कभी किसी सीन के बीच होती, कभी ब्रेक के दौरान होती। कई बार ऐसा भी होता कि मधुबाला चुपचाप अपनी गाड़ी तक पहुंचती और कुछ देर के लिए दिलीप कुमार के साथ ड्राइव पर निकल जाती। मंजू गुप्ता अपनी किताब मधुबाला हर लाइफ स्टोरी में लिखती हैं कि रक्सी सिनेमा में एक प्रीमियर के दौरान उन्होंने मधुबाला और दिलीप कुमार को हाथ थामे अंदर जाते हुए देखा। उनके शब्दों में यह मंजर ऐसा था जो याद से कभी नहीं मिटाया जा सकता। पहली बार दोनों को यूं सबके सामने देखा गया था।

बाद में दिलीप कुमार ने भी अपनी आत्मकथा में मधुबाला का जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि वह ऐसी शख्स थी जो उन्हें उनके संकोच से बाहर निकाल सकती थी। यह रिश्ता 1956 में नया रंग लेता है। मंजू गुप्ता जिक्र करती हैं एक दिन सेट पर दिलीप कुमार ने एक्टर ओम प्रकाश को अपने पास बुलाया। वह मधुबाला के मेकअप रूम में थे। कमरे का माहौल अलग था। ओम प्रकाश से कहा गया कि वह बस बैठे और जो हो रहा है उसके गवाह बने। ओम प्रकाश के मुताबिक दिलीप कुमार ने मधुबाला से कहा कि वह उसी दिन उनके साथ चलें और शादी कर लें। उन्होंने बताया कि घर पर काजी मौजूद है।

सब इंतजाम हो चुका है और वह आज ही निकाह करना चाहते हैं लेकिन इसके साथ एक शर्त भी थी। मधुबाला को अपने पिता को छोड़ना होगा। फिर उनसे कभी नहीं मिलना होगा। मधुबाला ने सिर्फ इतना कहा कि यह मुमकिन नहीं है। इससे आगे उन्होंने कुछ नहीं कहा। दिलीप कुमार बार-बार पूछते रहे, समझाते रहे, यह भी कहा कि अगर वह अभी चले गए तो फिर कभी वापस लौट कर नहीं आएंगे और यह प्यार की कहानी यहीं पर खत्म हो जाएगी। कमरे में कुछ पल की खामोशी रही। मधुबाला चुप रही। फिर दिलीप कुमार उठे और अकेले बाहर चले गए। मंजु गुप्ता के मुताबिक करीब 9 साल चला यह रिश्ता यहीं आकर रुक जाता है।

अपनी आत्मकथा द सब्सटेंस एंड द शैडो में दिलीप कुमार लिखते हैं कि मैं मधुबाला की तरफ आकर्षित था। एक कलाकार के तौर पर भी और एक औरत के तौर पर भी। वह बेहद जीवन और फुर्तीली महिला थी। उनके मेरे जैसे शर्मीले और अंतर्मुखी शख्स को संवाद स्थापित करने में कोई दिक्कत नहीं होती थी। 1956 में नया दौर फिल्म की तैयारी हो रही थी। निर्माता थे बी आर चोपड़ा। कलाकारों में मधुबाला और दिलीप कुमार शामिल थे। शुरुआती 10 दिन की शूटिंग तो स्टूडियो में हुई। इसके बाद भोपाल के पास आउटडोर शूटिंग तय की गई। यहीं से मामला बदल गया। अताउल्लाह खान ने मधुबाला को आउटडोर शूटिंग के लिए भेजने से मना कर दिया।

उनका कहना था कि शूटिंग मुंबई में हो सकती है। दूसरी तरफ फिल्म की योजना आउटडोर पर ही टिकी थी। बात बढ़ी और फैसला आया। मधुबाला की जगह वैजंती माला को ले लिया गया। इसके बाद अखबारों में इश्तहार छपे। एक तरफ नया दौर के विज्ञापन मधुबाला के नाम पर कट का निशान लगा और उनकी जगह नई तस्वीर छपी। जवाब में अताउल्लाह खान ने भी इश्तहार दिया। अपनी बेटी की फिल्मों की सूची के साथ और नया दौर पर वही कट का निशान लगा दिया। मामला यहीं नहीं रुका। बी आर चोपड़ा ने ₹30,000 की वापसी के लिए केस किया। दूसरी तरफ मधुबाला और उनके पिता की तरफ से भी कानूनी जवाब आया और देखते ही देखते फिल्म इंडस्ट्री दो हिस्सों में बंट गई।

जब मामला अदालत में पहुंचा, तो सबसे बड़ा सवाल था कि दिलीप कुमार किसके पक्ष में खड़े होंगे? अदालत में उनसे पूछे गए सवालों में एक सवाल यह भी था कि क्या वह मधुबाला से मोहब्बत करते हैं? उन्होंने जवाब दिया हां मैं मधुबाला से प्यार करता हूं और करता रहूंगा। लेकिन गवाही उन्होंने बी आर चोपड़ा के पक्ष में दी। उनका कहना था कि आउटडोर शूटिंग से इंकार करना कॉन्ट्रैक्ट के खिलाफ है। इस बयान के बाद प्रतिक्रिया भी आई। एक्ट्रेस और मधुबाला की दोस्त नादिरा ने कहा कि मधुबाला ने उन्हें अपना दिल दिया लेकिन वह अपने वादे पर खरे नहीं उतरे। अदालत में अताउल्लाह खान ने भी सवाल उठाया कि अगर यह मोहब्बत है तो फिर यह कैसा साथ? मधुबाला ने अपने वकील से सिर्फ इतना कहा, “मुझे यकीन नहीं हो रहा कि यह वही आदमी है जिससे एक वक्त मैंने प्यार किया था।”

मधुबाला के परिवार की तरफ से कहा गया कि उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती। दिल की बीमारी की वजह से आउटडोर शूटिंग उनके लिए मुश्किल थी। यह बात उस समय सार्वजनिक नहीं थी कि वह दिल के छेद की बीमारी से जूझ रही हैं। दूसरी तरफ दिलीप कुमार का मानना था कि अताउल्लाह खान की सख्ती की वजह से यह हालात बने हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा था कि उन्होंने सुलह कराने की कोशिश की थी लेकिन बात नहीं मानी गई। मधुबाला की बहन के अनुसार बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौते की कोशिश भी हुई। मगर एक बात बीच में रह गई। मधुबाला चाहती थी कि दिलीप कुमार उनके पिता से माफी मांग ले। यह नहीं हो पाया और यहीं से रास्ते अलग हो गए। दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में इसके बारे में लिखा है कि उन्होंने अपनी ओर से सुलह की बहुत कोशिश की थी लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और पूरे मामले में बी आर चोपड़ा का पक्ष सही था।

इसके बाद मधुबाला को यकीन हो गया कि दिलीप कुमार उनके पास कभी नहीं लौटेंगे। फिल्म मुगले आजम की शूटिंग जब आगे बढ़ी तब तक हालात बदल चुके थे। वही दो लोग जो कभी साथ बैठकर सीन की बातें करते थे। अब एक ही सेट पर होते हुए भी एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे। दुआ सलाम तक बंद हो चुकी थी। दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में लिखा हम पर्दे पर अमर प्रेम निभा रहे थे। लेकिन असल जिंदगी में हमारे रिश्ते खत्म हो चुके थे। एक मशहूर सीन है जिसे महेश भट्ट हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का सबसे एरोटिक और बोल्ड सीन कहते हैं।

सलीम की गोद में अनारकली सिर रखकर लेटी है। पंख से चेहरा छुआ जा रहा है और पृष्ठभूमि में उस्ताद तानसेन का आलाप चल रहा है। इस सीन को आज भी सबसे खूबसूरत रोमांटिक पलों में गिना जाता है। लेकिन उसी सीन की शूटिंग खामोशी में हुई थी। कैमरा चल रहा था, संगीत था मगर उनके बीच कोई बात नहीं थी। 50 के दशक तक मधुबाला की बीमारी सामने आ चुकी थी। मगर इसे छुपा कर रखा जा रहा था। जितना हो सके। वजह साफ थी। काम रुक जाता। कई फिल्मों का नुकसान हो जाता। फिल्म मुगले आजम के दौरान उनकी हालत लगातार बिगड़ रही थी। खांसी के साथ खून आना आम हो गया था। फिर भी शूटिंग जारी रही।

राजकुमार केशवानी अपने किताब दास्ताने मुगले आजम में लिखते हैं कि कई सीन में मधुबाला को असली लोहे की भारी जंजीरें पहनाई गई। डॉक्टरों ने मना किया था। वजन उठाने से बचने को कहा था। फिर भी सीन फिल्माया गया। जंजीरों की रगड़ से उनकी त्वचा छिल जाती थी। स्टूडियो की तेज रोशनी, गर्मी और ऊपर से बीमारी एक सीन में उन्हें कैदखाने में लंबे समय तक जंजीरों के साथ खड़ा रहना पड़ा। डॉक्टरों की हिदायत के बावजूद शूटिंग की गई और पूरी हुई।

फिल्म का एक और सीन है। सलीम को अनारकली को थप्पड़ मारना था। सेट पर मौजूद लोगों के मुताबिक दिलीप कुमार ने सीन में इतना जोर से थप्पड़ मारा कि सब सन्न रह गए। मधुबाला को संभलने में कुछ पल लगे। इस वाक्य का जिक्र कई लोगों ने किया जिनमें के आसिफ के करीबी लोग भी शामिल थे। सेट पर एक पल के लिए सन्नाटा सछा गया। इस फिल्म के लिए पहले नरगिस और नूतन को भी सोचा गया था। मगर आखिरकार अनारकली बनी मधुबाला जब उन्होंने यह फिल्म साइन की। उनकी उम्र करीब 20 साल थी। फिल्म को बनने में सालों लगे। लंबे समय तक एक ही किरदार के साथ जुड़े रहना आसान नहीं था। खासकर उस हालत में जब उनका दिल जवाब दे रहा था। अभिनेत्री नादिरा ने बाद में कहा कि इतने साल तक इस किरदार को निभाना वह भी उस बीमारी के साथ यह हर किसी के बस की बात नहीं थी। 5 अगस्त 1960 मुगले आजम रिलीज होती है। बंबई के मराठा मंदिर में प्रीमियर रखा जाता है। फिल्म का प्रिंट हाथी पर लाया जाता है।

मानो कोई शाही जुलूस हो। फिल्म ने रिकॉर्ड तोड़ दिए। यह अपने समय की सबसे बड़ी और सबसे महंगी फिल्मों में से एक बनी। लेकिन जिस चेहरे ने अनारकली को जिंदा किया वो उस शाम वहां नहीं थी। मधुबाला इतनी बीमार थी कि प्रीमियर में भी शामिल नहीं हो पाई। तराना संगदिल अमर के बाद यह जोड़ी फिर साथ दिखी मगर इस बार हालात अलग थे। पर्दे पर सलीम और अनारकली अमर हो गए। पर असल जिंदगी में कहानी खामोश हो गई। फिल्म के सेट पर शुरू हुई यह कहानी धीरे-धीरे एक अलग दिशा लेने लगी। चलती का नाम गाड़ी, ढाके की मलबल, झुमरू, हाफ टिकट जैसे प्रोजेक्ट्स के दौरान किशोर कुमार और मधुबाला साथ काम कर रहे थे। सेट पर उनका अंदाज बिल्कुल अलग होता था। मजाक, शरारत, अचानक गाने लग जाना, अजीब हरकतें करना और इन्हीं सबके बीच मधुबाला खुलकर हंसती थी।

एक बार फिल्म के सेट पर ही किशोर कुमार ने मधुबाला के सामने एक टेबल फैन के पास अपना हाथ ले जाकर रख दिया और कहा कि अगर वह उनका प्रस्ताव स्वीकार नहीं करेंगी तो वह अपना हाथ इस फैन में डाल देंगे। यह कोई फिल्मी सीन नहीं था। यह सेट पर हुआ एक पल है जिसने सबको चौंका दिया था। मधुबाला ने उन्हें रोका। माहौल हल्का हुआ। लेकिन यह बात यहीं दर्ज हो गई कि उनका अंदाज आम नहीं था। धीरे-धीरे यह साथ बढ़ता गया। उस दौर में मधुबाला के लिए शादी के प्रस्ताव भी आए। भरत भूषण, प्रदीप कुमार और किशोर कुमार। उन्होंने अपनी दोस्त नरगिस से बात भी की। सलाह कुछ और थी मगर रास्ता अलग चुना गया। किशोर कुमार लगातार उनके करीब रहने की कोशिश करते रहे। कई बार सिर्फ इस वजह से फिल्में साइन करते थे कि उनके साथ काम करने का मौका मिलेगा। 1960 के आसपास उनकी जिंदगी में एक और फैसला आया। तबीयत बिगड़ रही थी। लंदन जाकर इलाज करने की बात हुई। इसी बीच मधुबाला ने अपने करीबियों से कहा कि वह शादी करना चाहते हैं। जब किशोर कुमार को यह बात पता चली वो मिलने पहुंचे। अताउल्लाह खान चाहते थे कि इलाज के बाद शादी हो मगर इंतजार हुआ ही नहीं।

दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली। शादी के लिए किशोर कुमार ने धर्म परिवर्तन भी किया और करीम अब्दुल्ला नाम रखा गया। बाद में परिवार को मनाने के लिए हिंदू रीति से भी शादी हुई। मगर उनका परिवार इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर पाया। शादी के बाद दोनों लंदन गए। उम्मीद थी कि ऑपरेशन से हालात सुधरेंगे। मगर डॉक्टरों ने साफ कहा कि सर्जरी बहुत जोखिम भरी है। मधुबाला के पास महज कुछ ही साल बचे हैं और नतीजे तय नहीं है। यह खबर दोनों के लिए एक झटका थी। इसके बाद हालात बदलने लगे। मधुबाला की तबीयत गिरती गई। वह अरेबियन विला में रहने लगी। किशोर कुमार अपने काम में व्यस्त होते गए। मुलाकातें कम होती गई। एक समय था जब हल्की तबीयत खराब होने पर वह शूटिंग छोड़कर आ जाते थे।

अब कई दिन निकल जाते थे। जब मधुबाला ने साथ रहने की बात की तो जवाब मिला कि वह अकेले हैं देखभाल नहीं कर पाएंगे। इस दौरान वह संगीतकार नौशाद के पास जाती रहीं और रोती रहीं। नौशाद ने उन्हें कई बार नई शुरुआत करने की सलाह दी। मगर मधुबाला ने अपने रिश्ते को तोड़ने का फैसला नहीं लिया। बीमारी बढ़ती रही, काम रुकता गया। फिर भी उन्होंने कोशिश की। 1946 में चालाक की शूटिंग शुरू हुई। मगर पहले ही दिन बेहोश हो गई मधुबाला और फिल्म बंद करनी पड़ी। इसके बाद उन्होंने निर्देशन की तरफ रुख किया। फर्ज और इश्क नाम की फिल्मों पर काम शुरू किया। मगर सेहत ने साथ यहां भी नहीं दिया। दोनों ही अधूरी रह गई। अरेबियन विला में वक्त बीतता रहा। बाहर की दुनिया उन्हें एक सितारे की तरह याद करती रही और अंदर उनकी जिंदगी धीरे-धीरे सिमटती रही। और फिर वो वक्त भी आया जब मधुबाला पूरी तरह बिस्तर पर आ गई। उनकी बहन मधुर भूषण के मुताबिक उनकी बीमारी ऐसी थी कि शरीर में खून जरूरत से ज्यादा बनने लगा था। फिर वही खून नाक और मुंह से बहने लगता। डॉक्टर बार-बार उनके शरीर से अतिरिक्त खून निकालते थे। जिस्म कमजोर होता गया।

हालात यहां तक पहुंचे कि बस हड्डियां और खाल बची रह गई थी। वह जो कभी पर्दे पर रोशनी की तरह चमकती थी। अब घंटों बिस्तर पर लेटी रहती। रेडियो पर वही गाने सुनते हुए जिनसे वह कभी दुनिया की धड़कन बनी थी। बाहर की दुनिया से लगभग कट चुकी थी। घर में सख्त पहरा था। मिलने जुलने पर पाबंदी थी। इस तनहाई में भी उनके पास चिट्ठियां आती थी फैंस की जो अब भी उन्हें उसी तरह मोहब्बत करते थे। इसी दौर का एक बेहद मार्मिक किस्सा भी है। निर्देशक शक्ति सामंत को एक दिन मधुबाला का फोन आया।

उन्होंने कहा मुझसे मिलिए। जब वह पहुंचे तो सामने एक बहुत कमजोर बीमार मधुबाला थी। लेकिन पूरे मेकअप में उन्होंने हैरानी से पूछा मधु तुम्हें मेकअप की क्या जरूरत है? मधुबाला ने धीमी सी आवाज में कहा शक्ति आपने मुझे हमेशा मेरे सबसे खूबसूरत रूप में देखा है। क्या आप मुझे ऐसे देख पाएंगे? यह सुनकर शक्ति सामंत की आंखें भर गई। वह कुछ कह नहीं पाए बस उठकर चले गए। वक्त के साथ उनकी सांसे भी उनका साथ छोड़ने लगी। हर 4 घंटे में ऑक्सीजन देना पड़ता था। आईना अब उन्हें सुकून नहीं देता था बल्कि डराता था। जिस खूबसूरती पर पहले दुनिया फिदा थी, उसी के टूटने का दर्द उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। इन आखिरी दिनों में उन्होंने एक अधूरी ख्वाहिश को फिर से छुआ। दिलीप कुमार से मुलाकात। दिलीप कुमार बाद में याद करते हैं वह मरना नहीं चाहते थे। उन्होंने मुझसे पूछा, अगर मैं ठीक हो जाऊं तो क्या हम सात काम करेंगे? उन्होंने हां कहा, दिलासा दिया।

पर यह वादा कभी पूरा नहीं हो सका। उस मुलाकात में बहुत दिनों बाद मधुबाला के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई। उन्होंने कहा, हमारे शहजादे को आखिरकार शहजादी मिल ही गई। मैं तुम्हारे लिए खुश हूं। यह मधुबाला ने उनकी पत्नी सायरा बानो के लिए कहा था। दिलीप कुमार ने सायरा बानो से शादी कर ली थी। 21 फरवरी 1969 तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई। किशोर कुमार उस रात उनके पास रुके। मधुबाला ने उनसे कहा, रुक सको तो रुक जाओ मगर काम का नुकसान मत करना। अगले दिन हालात थोड़े जब संभले तो किशोर कुमार चले गए लेकिन 22 फरवरी की रात फिर हालात बिगड़े। उन्हें वापस बुलाया गया। घर में सन्नाटा था, दुआएं थी और एक इंतजार था। उस आखिरी लम्हे में मधुबाला ने सिर्फ इतना कहा मुझे शांति से मरने दीजिए। और फिर 23 फरवरी 1969 रात 9:20 एक सितारा हमेशा के लिए बुझ गया। अभिनेत्री और उनके खास दोस्त नादिरा ने एक इंटरव्यू में कहा था कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें आप हमेशा मुस्कुराते हुए ही याद रखना चाहते हैं। मधुबाला उन्हीं में से एक थी और फिल्मफेयर ने लिखा वो एक ऐसी चिड़िया थी जिसके पर काट दिए गए थे।

एक ऐसी रोशनी जो तन्हाई में बुझ गई। मधुबाला चली गई पर उनकी हंसी, उनकी आंखें और उनका जादू आज भी कहीं जिंदा है। जिस वक्त मधुबाला ने दुनिया को अलविदा कहा, दिलीप कुमार मद्रास में अपनी फिल्म गोपी की शूटिंग में व्यस्त थे। खबर मिलते ही वह मुंबई के लिए रवाना हुए। लेकिन जब तक वह पहुंचते सांता क्रोस के जहू मुस्लिम कब्रिस्तान में मधुबाला को दफन किया जा चुका था। वह उनकी आखिरी झलक भी नहीं देख पाए। वह सीधे कब्रिस्तान पहुंचे और बस खामोशी से उनकी कब्र के पास खड़े होकर दुआ करते रहे। कम लोग जानते हैं कि मधुबाला का रिश्ता सिर्फ फिल्मों या शोहरत तक सीमित नहीं था।

उनका एक गहरा आध्यात्मिक पक्ष भी था। वह गुरु नानक देव की बहुत बड़ी श्रद्धालु थी और अंधेरी के गुरुद्वारों से उनका एक खास जुड़ाव था। अपने करियर के चरम पर जब वह थी तो एक नियम उन्होंने बना रखा था कि पूरे साल कहीं भी शूटिंग कर रही हो लेकिन गुरु पर्व के दिन वह अंधेरी गुरुद्वारे जरूर जाएंगी। म्यूजिक डायरेक्टर ए एस महेंद्र ने एक घटना साझा की थी कि एक दिन सेट पर खाली समय में मधुबाला ने पर से एक छोटी किताब निकाली और चुपचाप पढ़ने लगी। बाद में जब उन्होंने देखा तो वह जपू जी साहिब थे जो फारसी भाषा में लिखी हुई थी। मधुबाला ने बताया कि जब मैं अंदर से टूट चुकी थी तब गुरुद्वारे ने ही मुझे राह दिखाई। उन्हें गुरुमुखी नहीं आती थी। इसलिए उन्होंने इसे फारसी में मंगवाया क्योंकि इसे पढ़कर उन्हें सुकून मिलता था।

वह सिर्फ श्रद्धालु ही नहीं बल्कि सेवक भी हर साल गुरु नानक जयंती पर लंगर का पूरा खर्च वह खुद उठाती थी। उनके जाने के बाद भी यह सेवा सालों तक उनके पिता ने जारी रखी। आज भी अंधेरी गुरुद्वारे में अरदास के समय एक पंक्ति जोड़ी जाती है कि हे सच्चे बादशाह आपकी बच्ची मधुबाला की तरफ से लंगर सेवा हाजिर है। करीब 22 साल के करियर में मधुबाला ने लगभग 70 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और हर किरदार को यादगार बनाया। उनकी फिल्म मुगले आजम आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी फिल्मों में गिनी जाती है। साल 2004 में इसे रंगीन करके दोबारा रिलीज किया गया और तब भी दर्शकों ने उसे इतनी ही मोहब्बत से अपनाया।

उनके सम्मान में 2008 में इंडिया पोस्ट ने डार्क टिकट जारी किया। 17 में मैडम टूर्ड्स ने उन्हें अनारकली के रूप में अपने संग्रहालय में जगह दी। साल 2019 में Google ने उनकी जयंती पर डूडल बनाकर उन्हें याद किया और द न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी उन्हें विशेष श्रद्धांजलि दी। किस्मत का एक अजीब मोड़ भी आया। साल 2010 में जब उनकी कब्र को नई जगह बनाने के लिए हटा दिया गया और उनके अवशेष एक अज्ञात स्थान पर ले जाए गए। फिर भी कुछ चीजें मिटती नहीं है। ना उनकी मुस्कान, ना उनकी आंखों की चमक और ना ही उनकी अदाकारी का जादू। मधुबाला सिर्फ एक नाम नहीं है। वो भारतीय सिनेमा का वह सितारा है जो डूब कर भी हमेशा रोशनी देता रहेगा। l

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