क्या आप जानते हैं बॉलीवुड की वह कौन सी सबसे अमर फिल्म थी जो राजेश खन्ना के पास सिर्फ एक लास्ट चॉइस बनकर आई थी। लेकिन अगर उस दिन एक चौकीदार ने दरवाजा खोल दिया होता तो शायद वह फिल्म वैसे कभी नहीं बनती जैसे आज हम उसे देखते हैं। आज के वीडियो में जानेंगे आखिर क्या था वो किस्मत का खेल और जानेंगे उस गाने का राज जिसकी धुन फिल्म बनने से 20 साल पहले ही तैयार हो चुकी [संगीत] थी। नमस्कार, मैं हूं सुधांशु और आप सुन रहे हैं
दिल नए गीत पुराने जहां हम हर हफ्ते खोलते हैं पुरानी फिल्मों और गानों के अनसुने किस्सों की एक नई परत। एक गेटकीपर, एक गलतफहमी और एक 20 साल पुरानी धुन। इन तीन चीजों ने मिलकर बनाई बॉलीवुड की सबसे अमर फिल्मों में से एक आनंद। लेकिन अगर उस दिन दरवाजा खुल जाता तो शायद यह फिल्म और इसका सबसे दर्द भरा गाना शायद कभी नहीं बनता। इस कहानी की शुरुआत होती है ऋषिकेश मुखर्जी से। एक ऐसे निर्देशक जो फिल्मों में कहानी नहीं जिंदगी उतार देते थे। आनंद की प्रेरणा उन्हें एक जापानी फिल्म से मिली जिसका नाम है इकी। लेकिन इसका दिल और इसकी आत्मा आई एक इंसान से जिसका नाम है राज कपूर जो ऋषिदा को प्यार से बाबू मुशाय बुलाते थे।
जब एक दिन राज कपूर गंभीर रूप से बीमार पड़े तो ऋषिदा के मन में एक डर पैदा हुआ। उन्हें लगा अगर मैं इन्हें खो दूं तो और यही डर यही भावना बन गई आनंद की कहानी। लेकिन इस फिल्म की कास्टिंग सीधी नहीं थी। बल्कि पूरी तरह फिल्मी थी। सबसे पहले शशि कपूर और राज कपूर को लिया जाना था। पर किसी वजह से वह हो नहीं पाया। फिर ऋषिदा ने अपना प्लान बदला और इस फिल्म को बंगाली भाषा में बनाने का निर्णय लिया। और इस फिल्म के बाबू मोसाई बन गए उत्तम कुमार। पर किसी कारण यह भी प्लान खारिज हो गया। और अब इस फिल्म के संभावित कलाकारों में शामिल हुए हर हुनरी और सदाबहार कलाकार किशोर कुमार और महमूद। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था और कहानी में गलतफहमी को आना लाजमी था। तो उसका हुआ ऐसे ऋषिदा एक दिन किशोर कुमार से मिलने उनके घर पहुंचे। लेकिन चौकीदार ने उन्हें अंदर जाने ही नहीं दिया। क्या कारण था इसका? उस समय किशोर कुमार का एक बंगाली इवेंट मैनेजर से झगड़ा चल रहा था। उन्होंने अपने चौकीदार को आदेश दिया था अगर कोई बंगाली आए तो उसे अंदर मत आने देना। चौकीदार ने ऋषिकेश मुखर्जी को वही बंगाली समझ लिया और उन्हें भगा दिया। यह घटना ऋषिदा के दिल पर लग गई और उन्होंने फिर फैसला किया कि अब वह किशोर कुमार के साथ काम नहीं करेंगे।
इसके बाद महमूद ने भी किसी कारणवश यह फिल्म छोड़ दी। अब सवाल था आनंद बनेगा कौन? कुछ समय के लिए धर्मेंद्र का नाम भी सामने आया। लेकिन वह भी किसी कारण इस फिल्म का हिस्सा नहीं बन पाए और आखिरकार यह रोल उस वक्त के सुपरस्टार राजेश खन्ना के पास गया और फिर बाकी इतिहास बन गया। दिलचस्प बात तो यह है कि उस समय किशोर कुमार राजेश खन्ना की आवाज बन चुके थे। लेकिन आनंद में किशोर कुमार का एक भी गाना नहीं है। अब बात करते हैं उस गाने की जिसकी धुन 20 साल पुरानी थी। और वो गाना जिसने दो दोस्तों की सालों पुरानी दोस्ती को खत्म कर दिया। आनंद फिल्म का वह अमर गीत जिसे सुनकर आज भी आंखें नम हो जाती है। उसके पीछे एक ऐसी कड़वाहट छिपी थी जिसने बॉलीवुड के दो दिग्गजों को हमेशा के लिए अलग कर दिया। जब आनंद की कहानी बन चुकी थी और किरदार तय हो चुके थे तब जरूरत थी एक ऐसे गाने की जो सिर्फ सुना ना जाए बल्कि महसूस किया जाए। और तभी जन्म हुआ उस धुन का जो आज भी हर डूबते सूरज के साथ हमारे कानों में गूंजती है। कहीं दूर जब दिन ढल जाए। लेकिन क्या आप जानते हैं
यह गाना पूरी तरह नया नहीं था। इसकी जड़े करीब 20 साल पुरानी थी। दरअसल यह धुन पहले एक बंगाली गीत अमाय प्रोषक और नील ध्रुव तारा के रूप में सलील चौधरी ने तैयार की थी। जिसे अपनी आवाज दी थी हेमंत कुमार ने। सालों बाद जब आनंद बन रही थी तो इसी धुन को फिर से जिया गया। एक नई भाषा और नई भावनाओं के साथ। यहां एक बात ऐसी भी है जो बहुत कम लोग जानते हैं। सलील चौधरी को संगीत की दुनिया में लाने वाले हेमंत कुमारी थे।
हेमंत दास सलील दा को अपना डिस्कवरी मानते थे। जब इस बंगाली धुन को हिंदी में ढालने की बात आई तो हेमंद दा को पूरा यकीन था कि यह गाना उन्हीं के पास आएगा। आखिर ओरिजिनल धुन भी उन्हीं की आवाज में तो अमर हुई थी। लेकिन जब उन्हें पता चला कि सलील दा ने यह गाना उनके बजाय मुकेश को दे दिया है तो उन्हें गहरा सदमा लगा। यह सिर्फ एक गाना छीनने की बात नहीं थी। यह उस भरोसे के टूटने की बात थी जो सालों पुराना था। कहा जाता है कि इस एक फैसले के बाद इन दो दिग्गजों के बीच के रिश्ते फिर कभी पहले जैसे नहीं रहे। इस गीत को लिखा था योगेश ने एक ऐसे गीतकार जिनकी जिंदगी खुद भी अकेलेपन और संघर्ष से भरी थी। कहा जाता है इस गाने के शब्द किसी कल्पना से नहीं बल्कि योगेश के अपने एहसासों से निकले थे। कहीं दूर जब दिन ढल जाए सांझ की दुल्हन बदन चुराए यह सिर्फ लाइन नहीं थी
यह एक एहसास था धीरे-धीरे खत्म होती जिंदगी का। इस गीत को आवाज मिली मुकेश की एक ऐसी आवाज जिसमें दर्द खुद ब खुद उतर आता था। कहा जाता है जब मुकेश ने यह गाना रिकॉर्ड किया तो स्टूडियो में मौजूद लोग कुछ पल के लिए खामोश हो गए। क्योंकि वह सिर्फ गाना नहीं था। वह एक एहसास था जो सीधे दिल में उतर गया। इस गाने में आनंद की पूरी जिंदगी छुपी है।
एक मुस्कुराता हुआ चेहरा और उसके पीछे छुपा अकेलापन। एक इंसान जो जानता है कि उसकी जिंदगी सीमित है फिर भी हर पल को मुस्कुरा कर जीता है। लेकिन कहीं अंदर एक अकेलापन भी है और यही द्वंद इस गाने को अमर बना देता है। जब फिल्म में यह गाना आता है तो लगता है जैसे समय रुक गया हो। जैसे जिंदगी ढ रही हो और दूर कहीं कोई सपना धीरे-धीरे खो रहा हो। और शायद यही वजह है कि आनंद सिर्फ एक फिल्म नहीं एक एहसास बन गई। जहां हर डायलॉग, हर सीन और हर गाना सीधे दिल से जुट जाता है। कभी-कभी सबसे अमर गाने समय से नहीं एहसास से बनते हैं। अगर आप ऐसी अनकही कहानियां और सुनना चाहते हैं तो चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें क्योंकि यहां हर कहानी में छुपा है एक नया एहसास। धन्यवाद।