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इतिहास को कैमरे करने वाले रघु राय कहानी

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तुम्हारी तस्वीर, तुम्हारे काम में इतनी एनर्जी, इतना एक्सप्रेशन, ऐसा मोमेंट होना चाहिए दैट कैन लिव फॉर इटसेल्फ। गेस्ट इन द न्यूज़ रूम में आज के मेहमान हैं रघुराय। मैं बिल्कुल शुरू से शुरू करता हूं। शुरू से तो मैं भी नहीं जानता। देखिए फोटोग्राफी में सिंपल बात है। इफ यू आर नॉट क्लोज इनफ योर फोटोग्राफ्स आर नॉट गुड इनफ। मैं जहां भी जाता था किसी को आसपास रुकने नहीं देता था। ठीक वहां पहुंचता था हेड ऑन वेयर द स्पॉट इज। आई वास 4 फीट अवे फ्रॉम शास्त्री जीस बॉडी और लकीली रात को खींची हुई है। उस जमाने में शार्प भी आ गई, इमोशन भी आ गई। काम हो गया। वो तस्वीर भी छपी है जब संजय का प्लेन क्रैश हुआ था उस साइड की। व्हाट यू देर? हां यू नो व्हेन हिज बॉडी वाज़ ब्रॉट एंड इंदिरा गांधी शी वाज़ वेयरिंग ब्लैक ग्लासेस डार्क ग्लासेस सो दैट नोबडी कैन सी हर आईज शी वाज टॉर्न शी वाज़ मिज़रेबल अगर सिक्योरिटी वाला कोई आगे भी आ जाता था हम कहते थे देखिए इंदिरा जी ये

क्या और हम इंदिरा जी कहते थे हम ये नहीं कहते थे प्रधानमंत्री 1984 दिसंबर का पहला हफ्ता भोपाल गैस ट्रेजडी नेक्स्ट डे हम पहुंचे बट वी एस प्रेसमैन वी डिट इवन थिंक के यार वो गैस का कुछ हिस्सा अभी भी एटमॉस्फियर में होगा। डेड एनिमल्स पड़े हैं, ब्लोटेड बॉडीज पड़े हैं। डेड ह्यूमन बीइंग्स, चिल्ड्रन बीइंग ब्रॉट टू द हॉस्पिटल ऑलमोस्ट। उस जमाने में जब एडिटर्स एडिटोरियल लिखते थे तो सरकारें हिलने लगती थी। आज कोई लिख के दिखा दो। मैं जब बच्चा था चारप साल का तो पार्टीशन हुई थी। मैंने वो पार्टीशन में हमारे घर जलते देखे हैं। इसलिए मेरा जो रिलेशनशिप और कांटेक्ट और इंटेंसिटी है वास मच क्लोजर बिकॉज़ आई हैव बीन थ्रू दोज़ एक्सपीरियंसेस। कहने को आप कह सकते हैं कि भाई जीनियस होगा। अब जब आप जीनियस किसी को कहते हैं तो बाकी लोगों के ज़हन पे आप बोझ डालते हैं। सी दिस इज अ सिंपल साइकोलॉजी कि आपको लगता है यार वो तो जीनियस था। टट्टू।

हर एक के अंदर जीनियस बैठा है। तुम्हारी जर्नी कहां से शुरू होती है? इस व्हाट मैटर्स? इसमें पानी है। जी सर। और ये गिलास है। खुलता भी है। नहीं सर वो उल्टा कर देना सर। ऐसे दलाई लामा से मिलना कैसा था? हम इंटरव्यू के बाद हम श्रीनगर जा रहे थे। बाय कार। टवलीन मुझे ऐसे करके दिखाती है। सी शी वाजस्िंग अ लाल रेड बैंड। सी सी दिस इज व्हाट ही है गिवन मी बट हैव यू गॉट मैं इतना शरारती आदमी हूं मैंने कहा यू नो बिटवीन इक्वल्स वी डोंट एक्सचेंज सच थिंग्स मैंने तो खुदा बनते देखे हैं और जगह भी और एक दिन बुक करूंगा मेकिंग ऑफ गॉड भिंडरा वाले का जिक्र कर लेते हैं आपने उसकी आखिरी तस्वीर ऑपरेशन ब्लू स्टार की ठीक एक दिन पहले खींची थी काल तख्त में एक बल्ब जला हुआ है अंदर तीसरी मंजिल पे अकेला बैठा है चारपाई में। तू क्यों आया यहां? क्यों आया तू? यह कक्षाओं में पढ़ाए गए सबक के जीवंत होने का वक्त है। जब आप यह इरादा करते हैं कि पत्रकार बनना है तो कुछ वाक्य सूक्तियों की तरह आपके सामने दोहराए जाते हैं। जिसमें से एक वाक्य होता है कि एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है। लेकिन जब आप तस्वीर के व्याकरण को थोड़ा बहुत भी समझते हैं या उस अरण्य में दाखिल होने की कोशिश करते हैं जब एक खास पल को एक फ्रेम में कैप्चर किया गया तब आप समझते हैं कि अगर आपने इन रेखाओं इन भावों इन मंजरों को समझ लिया तो फिर शब्दों की गिनती करना भूल जाएंगे।

गेस्ट इन द न्यूज़ रूम लल्लन टॉप का वो प्रोग्राम जिसमें हम अलग-अलग हस्तियों को अलग-अलग फील्ड के एक्सपर्ट्स को बुलाते हैं। उसमें आज जो शख्स आए हैं उनका तारुफ हम सबसे ऐसे ही कराया गया और फिर हमने जिस संस्थान में काम किया जिस मैगजीन का मैं इस समय हिंदी का संपादक हूं। मुझे बहुत यह कहते हुए गर्व हो रहा है कि उस मैगजीन के लिए सबसे यादगार तस्वीरें जिस शख्स ने खींची हैं वो आज हमारे बीच हैं हिंदुस्तान के सबसे बड़े फोटो जर्नलिस्ट लेकिन उनका परिचय सिर्फ यहीं तक महदूद रखना गुनाह नहीं है क्योंकि जिस तरह के उन्होंने पोर्ट्रेट खींचे तस्वीरों के इर्दगिर्द जिस तरह के दर्शन का उन्होंने बयान दर्ज कराया जिस तरह से रंगीनियत पर कुर्बान हो चुकी दुनिया दुनिया को उन्होंने ब्लैक एंड वाइट का समीकरण समझाया। जिस तरह से उन्होंने तमाम चीजों को डॉक्यूमेंट किया ना सिर्फ तस्वीरों के जरिए बल्कि किताबों के जरिए भी तो ऐसे में हमें लगा कि इस शख्स को हम बुलाएं और दृश्यम की पूरी अवधारणा को समझें और कैसे वो अलग-अलग दौर में बदल रही है। गेस्ट इन द न्यूज़ रूम में आज के मेहमान हैं कमाल के कलाकार रघुराय। बहुत-बहुत स्वागत है सर आपका। मैं बिल्कुल शुरू से शुरू करता हूं। शुरू से तो मैं भी नहीं जानता। आप करिए। मेरा परिचय जिस शुरू से हुआ एक ये मेरी मेज पे गधे के बच्चे की तस्वीर रखी है। ये आपकी खींची हुई पहली तस्वीर थी। पहली तस्वीर थी। क्या है इसकी कहानी? इसकी कहानी वैसे तो मैं कई दफे बता चुका हूं लेकिन कहानी बिगिनिंग की है जैसा आपने कहा वो प्रेम की है। मैं इंजीनियरिंग किया था क्योंकि मेरे फादर ही वांटेड मी टू बी एन इंजीनियर। जी। क्यों? क्योंकि वो इरीगेशन डिपार्टमेंट में हेड ऑफ द एडमिनिस्ट्रेशन थे। पंजाब में। हां जी। और उनके बॉस जो थे वो चीफ इंजीनियर थे। तो लिहाजा वो चाहते थे कि उनका बेटा जो है वो हेड ऑफ द डिपार्टमेंट इंजीनियरिंग के बने। तो हमारे जमाने में हमें आजादी नहीं थी कि आप कहे नहीं जी मैंने तो यह करना है। ऐसी कोई गुस्ताखी करने की इजाजत दी नहीं जाती थी। तो हमने इंजीनियरिंग की। साल भर काम किया। बड़ा बोरिंग लगा 10 से पांच का। मैं दोपहर में जब लंच टाइम होता था तो इरीगेशन डिपार्टमेंट का ऑफिस जो था नदी के किनारे था तो मैं लंच करने जाता पेड़ के नीचे सो जाता था भूल जाता था कि ऑफिस है तो इस तरह से मैंने गुजारा एक साल तो वो जॉब एक साल के लिए थी फिर दोबारा मुझे अप्लाई करना था अप्लाई तो क्या करना मैं तो वहां से भाग लिया वो पंजाब में थी मैं दिल्ली में आया पॉल एस पॉल मेरे बड़े भाई जो फोटोग्राफर थे मैं उनके के पास रहने लगा तो मुझे समझ में नहीं आ रही थी अब मैं क्या करूं तो जो एस पॉल मेरे बड़े भाई थे वो बड़े ही रेप्यूटेड शानदार इंसान थे और उनके पास सारे फोटोग्राफर यंग फोटोग्राफर आते थे अपनी तस्वीरें दिखाने उस जमाने में इक्विपमेंट कैमरा मिलते नहीं थे तो किसी ने कोई एक वाइड एंगल किसी का आ गया तो दिखाने देखिए जी हमारे पास वाइड एंगल मिल गया है एक मिनट टेलीफोन इतनी गरीबी थी देश में तो मैं देखता था मैं कहता सब पागल लोग हैं यार ये सारे के सारे सिवाय कैमरा लेंस और फोटोग्राफ के इनको कुछ सूझता नहीं है और मेरे बड़े भाई के सूटकेसेस में कपड़े कम होते थे फोटोग्राफ्स से भरे होते थे तो मैं भी ताज्जुब करता था तो एक दिन उनका एक मित्र आया जो फार्मर था ओरिजिनली लॉट्स ऑफ लैंड एंड ही वास कीन ऑन डूइंग फोटोग्राफी तो मुझे उसकी एनर्जी बड़ी अच्छी लगी। पढ़ा लिखा था और बड़ा सेंसिटिव इंसान था। तो वो दो दिन ठहरा हमारे यहां और फिर वो जा रहा था अपने गांव।

कहता तो मैंने कहा क्या करेंगे आप? कहता है नहीं मुझे कुछ काम भी देखना है और मैं कुछ फोटो भी खींचूंगा अपने गांव में। तो मैंने अपने भाई साहब को कहा। मैंने कहा भाई साहब मुझे भी कैमरा दे दीजिए। मैं इनके साथ चला जाऊं दो-तीन दिन के लिए क्योंकि मैं कुछ नहीं कर रहा था। तो उन्होंने कहा हां चले जाओ। तो उन्होंने एक छोटा कैमरा मुझे थोड़ा एक्सपोज़र समझाया, फोकस दिखाया। उस दिनों क्या होता था? एक फोकस होता था, एक अपर्चर होता था, एक शटर स्पीड होती थी और एक वाइंडिंग। बस चार चीजें अनलाइक टुडेज़ डिजिटल कैमरा वेयर यू हैव सो मेनी फीचर्स व्हिच कोलाइड विद ईच अदर। वंस यू प्रेस द रॉन्ग नब्स यू आर गॉन। वहां चार फीचर्स होते थे। तो मैं चला गया उनके साथ। बड़ा मजा किया उनके साथ घूमता रहा। तो वो गांव में बच्चों की तस्वीर खींच रहे थे। शाम हो गई थी। मैं देख रहा था मेरे भी कैमरा लटका हुआ था। तो मैंने साइड पे देखा एक बेबी डोंकी खड़ा है। बड़ा प्यारा लग रहा है। तो मैंने उसको ऐसे खींचने की कोशिश की। तो वो और सिंपल कैमरा था तो टेलीफोटो तो था नहीं। तो वो दूर था तो मैं थोड़ा पास गया। थोड़ा और पास गया। वो भाग लिया। तो बच्चे जो खड़े थे बाहर वो सारे हंसने लग गए। तो फिर मैं उस गधे के इस बेबी डमकी के पीछे भागा और बच्चे तालियां बजा रहे हैं और खुशी कमाया। बेसिकली आई वास एंटरटेनिंग बच्चास बिकॉज़ जब वो भागा बट बेबी डोमकी तो बच्चा वर वेरी हैप्पी। सो आई चस्ड द बेबी डोमकी फॉर सम टाइम एंड देन ही गॉट टायर्ड एंड स्टुड देयर। देन आई टूक दिस पिक्चर। तो एक फिल्म मुझे एक्सपोज करने में लगे होंगे तीन चार पांच दिन। तो जब प्रोसेस की गई तो मेरे भाई साहब बोलते हैं अरे ये तो बड़ी अच्छी तस्वीर है। हमने कहा अच्छा जी अभी हमें क्या लेना देना तस्वीर से अच्छी है या बुरी? हम तो ऐसे खेल रहे थे। तो उन दिनों द टाइम्स लंदन न्यूज़ पेपर दे यूज्ड टू प्रिंट वन हाफ पेज पिक्चर एव्री वीकेंड तो उन्होंने अपनी भी दो-तीन भेजी मेरी भी भेज दी तो मेरी जो है छप गई उसमें तो जब न्यू न्यूज़पेपर छप के आया आधा पेज पे इतनी बड़ी तस्वीर रघुराय इंडिया तो सब ने कहा भाई बिग डील बिग डील बिग डील अच्छा मैंने कहा अच्छा बिग डील हो गई। तो फिर मुझे दिल में थोड़ी लालसा की खुजली हुई। तो मैंने कहा भाई साहब मैं मैं मैं भी फोटो खींचता हूं। तो मैं भी फिल्म एक लोड करता था। सारा दिन घूमता था। उनके पास तो ही वाज़ विद इंडियन एक्सप्रेस चीफ फोटोग्राफर। तो उनके पास तो डार्क रूम था। पर अच्छा नहीं लगता था कि मैं उनको कहूं मेरी फिल्म्स वहां प्रोसेस करें। तो फिर मैं शाम को घर में आके हमारा तीन बेडरूम का डिफेंस कॉलोनी में घर था। उसमें हम मैंने एक बाथरूम को अंधेरा करके उसमें वहां पे डिशेस लगा दी थी। तो आके फिल्म प्रोसेस करता था। और फिर जल्दी से खाना खा के फिर छोटा लार्जर भी ले लिया। प्रिंट बनाता था। सो दिस इज हाउ आई स्टार्टेड माय लाइफ। मैं अब यहां से सीधे मैंने जो आपकी किताब है पोट्रेट उसमें एक तस्वीर देखी। एक तो आपके भाई साहब की उसमें बड़ी दिलचस्प तस्वीर है जिसमें कई कुर्सियां रखी हुई है और वो क्योंकि हम चाहते हैं हमारे भाई साहब ऊंचे पेस्टल पे कई सारी कुर्सियां एक कुर्सी नहीं कई कुर्सियों के ऊपर विराजमान हो। वेरी थॉटफुल। इसमें एक तस्वीर है। आज हम यह बातचीत रिकॉर्ड कर रहे हैं। और कल की तारीख वो तारीख थी जब लाल बहादुर शास्त्री जी का देहांत हुआ था। और लाल बहादुर शास्त्री जी की अंतिम यात्रा की एक तस्वीर है जो आपने खींची थी। उस दिन के बारे में बताइए। उस असाइनमेंट उस दिन उस मंजर के बारे में। नहीं उनकी बॉडी जो है ताशकंदम से दिल्ली लाई गई थी। तब तक मैं स्टेट्समैन न्यूज़पेपर में चीफ फोटोग्राफर बन गया था। माफ़ कीजिएगा मुझे एक साल से कम मैं हिंदुस्तान टाइम्स में था। एज अ यंग फोटोग्राफर विद अनदर वेरी इंपॉर्टेंट फोटोग्राफर किशोर पारिक। और मेरे बड़े भाई पॉल इंडियन एक्सप्रेस के चीफ फोटोग्राफर किशोर पारिक हिंदुस्तान टाइम्स का और दोनों धाकड़ लोग और उनके बीच में मैं उन दोनों से 10 साल छोटा उम्र में और उन दोनों के बीच में मैं तो स्टेट्समैन के चीफ फोटोग्राफर रिटायर हुए वहां पे मुझे उन्होंने जॉब दे दी चीफ फोटोग्राफर की। तो एक तरफ मेरे बड़े भाई दूसरी तरफ हमारे किशोर पारिक जी मुझसे 10 साल बड़े बीच में मैं यंग फोटोग्राफर। अब जब व्हेन यू गेट सैंडविच बिटवीन द टू बिग गाइस। क्या होता है?

जब यूं हुआ तो या तो आप क्रश होकर वहीं समा गए और या फिर यूं हुआ तो आप पॉप अप किए। ऐसा भी होता है। तो मैंने सोचा दिल में मेरे भैया तूने मुझे कैमरा दिया छोडूंगा नहीं तुझे भी। और किसी और भी तो था। मैंने कहा आ जाओ बेटे। तो हम ऐसी मस्ती में काम करते थे। और एक दूसरे को देख के शोल्डर्स झाड़ के सफाई से क्या आ जाऊं ऐसे काम करते थे तो तब मेरे पास इक्विपमेंट जो था बड़ा कम था एक नॉर्मल लेंस था एक छोटा एक टेलीोटो था तो उसी के साथ मैं शास्त्री जी के घर पर पहुंच गया पर पता नहीं क्या था कि मैं जहां भी जाता था किसी किसी को आसपास रुकने नहीं देता था। ठीक वहां पहुंचता था। हेड ऑन वेयर द स्पॉट इज। तो आई आई वास 4 फीट अवे फ्रॉम शास्त्री जीस बॉडी। ललिता शास्त्री जी, उनकी वाइफ, उनके बच्चे सारे बैठे और लकीली रात को खींची हुई है। उस जमाने में ये टीवी कैमरा जो थे वो लाइट ले चलते थे। तो उनकी लाइट में मैंने वो तस्वीर बनाई थी। श्राप भी आ गई, इमोशन भी आ गई, काम हो गया। और किस तरह की खुसफुसाहट थी वहां पर जो बातचीत हो रही थी जो आज की तारीख में उनकी मृत्यु को लेके बहुत सारी चर्चाएं होती हैं। क्या उस समय वो चर्चा हो रही थी? नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं हो रहा था। देखिए मेरी बात सुनिए। सच बात ये भी है कि चर्चाएं तो पत्रकार शुरू करते हैं। दे वांट टू डिग आउट समथिंग डिफरेंट। समथिंग न्यू। समथिंग अनएक्सेक्टेड ऐसी भी कि हमारा हमारी दुनिया में हर हर बात तो नहीं थी। अब जरूरत पड़ रही है और अब आप कर नहीं सकते। हमारे जमाने में देखो थिंग्स वर वेरी स्ट्रेट। इवन व्हेन इंदिरा गांधी टूक ओवर एस द प्राइम मिनिस्टर ऑफ द कंट्री ही यूज़्ड टू बी व्हाट? 4 फीट 5 फीट अवे टेकिंग पिक्चर्स। मैंने जो लास्ट जो मैंने जर्नलिस्टिक काम किया था

जब 2014 में कांग्रेस सेशन हुआ था। आई वेंट देयर आफ्टर मे बी 12 इयर्स हम एंड देन द नेक्स्ट डे वाज़ बीजेपीस सेशन। वहां पे मैं मतलब यूं समझिए कि 14-15 साल के बाद पॉलिटिकल हैपनिंग में गया था। जहां पे इनकी कांग्रेस सेशन हो रहा था, बीजेपी सेशन हो रहा था। एंड आई रियलाइज़ यू आर केप्ट अवे एटलीस्ट 40 फीट अवे फ्रॉम द मेन डायर्स। लकीली आई हैड अ बिग टेली फोटो ऑन माय डिजिटल कैमरा एंड आई कुड टेक पिक्चर्स। अदरवाइज़ देखिए फोटोग्राफी में सिंपल बात है। इफ यू आर नॉट क्लोज इनफ योर फोटोग्राफ्स आर नॉट गुड इनफ। तो वो जमाने अलग थे। यहां तक होता था कि अगर सिक्योरिटी इंदिरा प्राइम मिनिस्टर की सिक्योरिटी जो चार पांच लोग ही होते थे जो हमें पहचानते भी थे और वो हमें रिस्पेक्ट भी देते थे। ऐसा नहीं है कि धक्का मार के रसों के पीछे फेंक दिया जो आप लोगों को फेंका जाता है। यू डिर्व दैट बट द फैक्ट इज़ कि अगर सिक्योरिटी वाला कोई आगे भी आ जाता था। हम कहते थे देखिए इंदिरा जी ये क्या और हम इंदिरा जी कहते थे। हम ये नहीं कहते थे प्रधानमंत्री इंदिरा जी तो शी विल गिव देम वन लुक एंड दे विल रन अवे। तो हमने ऐसे काम किए हैं और उसकी वजह से हमें जो मैंने इंदिरा गांधी पे भी बुक की है। आई वाज़ंट असाइन बाय एनी पॉलिटिकल पार्टी और लीडर। बट इन दोज़ इयर्स फॉर एवरीथिंग इट यूज़्ड टू बी इंदिरा गांधी। देयर वाज़ वन चैनल दूरदर्शन वि स्टिल एक्सिस्ट इंदिरा गांधी इंदिरा गांधी इंदिरा गांधी इंदिरा गांधी सोशल फंक्शन पॉलिटिकल फंक्शन कल्चरल फंक्शन इंदिरा गांधी इंदिरा गांधी पेज वन पेज थ्री इवन पेज फाइव तो वो जमाने वो भी

अजीब थे पर एक बात जो मैं इंपॉर्टेंट शेयर करना चाहूंगा वो ये है कि जब मैं इंदिरा गांधी जो पता नहीं 16 18 साल साल प्रधानमंत्री थी एट डिफरेंट दिस इंटरवल्स द लॉन्गेस्ट आई मीन हु सर्व द लॉन्गेस्ट इन दिस कंट्री सो फार लगभग 16 साल हां तो जब शुरू में ही पहले दो साल गुजरे तो मुझे यह सवाल उठा मेरे मन में कि यार इंदिरा गांधी इंदिरा गांधी इंदिरा गांधी क्या अगर कोई इंदिरा गांधी गांधी को नहीं जानता कोई गांव का कोई फॉरेनर और मेरी तस्वीर अगर वह देखें इंदिरा गांधी की बट जो नहीं जानते कौन बैठी है क्या मेरी तस्वीर फिर भी कुछ बात करती है उनसे ऑफ द सिचुएशन ऑफ द सरकमस्ट्ससेस ऑफ़ द एक्सप्रेशनंस ऑफ़ द एनर्जी अराउंड इट डस इट स्टिल कन्व समथिंग इफ इट डजंट देन इट्स अ डेड न्यूज़ पिक्चर एंड इन अ न्यूज़ेपर डेली न्यूज़ पिक्चर्स डाई अ डेली डेथ टुडे दे आर रिक्वायर्ड नेक्स्ट डे समथिंग एल्स इज़ हैपनिंग एंड यू मूव ऑन टू द नेक्स्ट वन। सो जो डेली न्यूज़पेपर की डेली डेथ जो थी मैंने समझ ली थी तभी और जब मैं इंडिया टुडे में भी 10 साल रहा था तो वीकली डेथ को भी मैं समझता था। तो तुम्हारी तस्वीर, तुम्हारे काम में इतनी एनर्जी, इतना एक्सप्रेशन, ऐसा मोमेंट होना चाहिए दैट कैन लिव फॉर इटसेल्फ। इंदिरा जी की हमने यहां पर भी कई तस्वीरें लगा रखी हैं। थोड़ी बहुत मेरी पॉलिटिक्स में दिलचस्पी है। तलाश के पुरानी चीजें देखता और पढ़ता रहता हूं। उस तस्वीर के बारे में बताइए। यह क्या ओल्ड गार्ड और इंदिरा के बीच टसल के दौर में खींची गई तस्वीरें जिसमें वह गांव तकिए पर बैठी हैं अकेली अधिवेशन देखिए वो बैठी है कांग्रेसमैन सीनियर कांग्रेसमैन के साथ कांग्रेस सेशन में जैसा मैंने आपको बताया ही कुड बी सिटींग दिस फार फ्रॉम देम सो वी हैड द क्लोजनेस ए बी नाउ लुक एट हर एक्सप्रेशन शी इज़ सिटींग देयर फिजिकली बट हर माइंड इज़ समवेयर एल्स एंड शी वाज़ वाज़ नोन फॉर दिस कि वो नापती तोलती रहती थी कि किसका मैंने क्या करना है। यू नो पॉलिटिशियंस बहुत कमाल भी बोलते हैं। उनके लिए उनके कॉपीराइटर्स मस्ट बी राइटिंग ग्रेट लाइंस एंड ग्रेट स्टोरीज। और अगर आप आके एज अ राइटर वही लिखते हैं

कि इंदिरा जी ने यह कहा, मोदी जी ने वो कहा इज नो रिपोर्टेड। यू नो व्हाई कि वो जो शब्दों का उच्चारण हुआ है जो शब्द इस्तेमाल किए गए हैं बड़े-बड़े मीनिंगफुल फॉर द नेशन फॉर द जर्नलिस्ट फॉर द कंट्री फॉर एवरीबॉडी उनके पीछे बोलने वाले के अंतरात्मा में वह सच्चाई है। अब वह सच्चाई आप कैसे जानेंगे? वह आंखों में दिखाई देती है। फेस इज द इंडेक्स ऑफ मैन ना। तो क्या जब आप वह शब्द बोल रहे हैं तुम्हारी आंखों में तुम्हारे फेस पे उस एक्सप्रेशन उस मीनिंग के साथ क्लोजनेस है। अब देखिए मैं कहता हूं आई लव यू। एक कहता है आई लव यू। इतना ही है ना बच्चों आप लोग अपनी गर्लफ्रेंड को शुरू किए तो होंगे ना ऐसे ही अब आप कहते हैं आई लव यू टू गेट टू हेल्प विद यू दूसरा कहता है आई लव यू यू से हां दिस इज एनर्जी दिस इज इमोशंस दिस इज एक्सप्रेशनंस तो क्या जो शब्द आप उच्चारण कर रहे हैं जो शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। वह आपके दिल से आ रहे हैं या आपकी जबान से आ रहे हैं। इतना फर्क चियर्स। यस। हां जी। और इस तरह की डिटेलिंग भी जिसमें पीछे नेहरू भी दिख रहे हैं, गांधी भी दिख रहे हैं। आपने इन पर जो किताब लिखी उसकी भी आखिरी पंक्ति मेरे ख्याल से यही है। यट शी वाज़ अ लोनली द हाई यू गो द लेसर यू हैव पीपल अराउंड यू। और जब वहां पहुंच जाते हैं तो फिर तो कोई भरोसा ही नहीं ना। इंदिरा गांधी के परिवार की एक और तस्वीर है जिसका खूब जिक्र होता है जिसमें सोनिया गांधी और राजीव और सोनिया के दोनों बच्चे नजर आ रहे हैं और इत्तेफाकन ये इत्तेफाकन कहिए या उनकी पार्टी और परिवार का वो ये चारों ही पॉलिटिक्स में इंदिरा जी रही हैं और बाकी तीनों अभी भी हैं। तो ये तो लग रहा है कि बड़े अंतरंग सेटअप में घर के भीतर खींची गई फोटो है। नहीं ऐसा था कि हमारे एक एडिटर होते थे स्टेट्समैन में डज़ डग ही वाज़ अ वेरी क्रिएटिव राइटर ही वुड आल्सो डिज़ द न्यूज़पेपर एंड मैगज़ीन ही विल आल्सो ड्रॉ मेक ड्रॉइंग्स एंड वेरी गुड ड्रॉइंग्स। तो हमें यूं समझिए कि मेरी फर्स्ट मेजर जॉब में मेरा जो था संबंध एक ऐसे बढ़िया क्रिएटिव आदमी से हुआ कि वो भी हमें जब हम कुछ अच्छा करते थे

तो हमें उठा के यूं भी लाता था और साथ में चैलेंज भी करता था और हमें फ्रीडम भी देता था। तो उसने कहा अ डे इन द लाइफ ऑफ इंदिरा गांधी करो तुम। तो शारदा प्रसाद जी इनके प्रेस सेक्रेटरी होते थे जो बहुत शानदार इंसान थे। शानदार तो उन्होंने हमें अडे दिया तो हम सुबह घर पहुंचे तो वहां से जो शुरू हुआ तो पहले उन्होंने कहा इंदिरा जी ने आप क्या पिएंगे रघु जी हमने कहा कुछ नहीं इंदिरा जी मैं खा पी के आया हूं। कहते नहीं अच्छा आपको लीची जूस पिलाते हैं। अब मैंने तो जिंदगी में कभी लीची जूस पिया नहीं था। पता नहीं आप में से कितनों ने पिया है। इट वाज़ वेरी डिलीशियस। वहां से शुरू हुए। देन शी हैड ब्रेकफास्ट। देन शी दिस वाज़ लेटर इन द इवनिंग एक्चुअली। एंड देन राहुल कमिंग एंड सेइंग बाय-बाय टू हर एंड ऑल दोज़ पिक्चर्स। उनके घंटे भर की ऑडियंस होती थी। दर्शन देती थी। ऑर्डिनरी पीपल विल कम इन द क्यूज़, सट देयर एंड शी विल मीट देम, टेक देयर लेटर्स एंड कंसर्न्स एंड एवरीथिंग एल्स। तो वो जमाने बड़े अलग थे और वही जमाना जब आगे बढ़ता है तो इमरजेंसी का दौर आता है और आपकी एक और बहुत चर्चित तस्वीर है। एक तस्वीर जो बता देती है कि मार्च 1977 का जनादेश क्या है? पहली दफा कांग्रेस सत्ता से बाहर होती है। और जो तस्वीर सबसे अहम थी उस जनादेश को दिखाने वाली उसमें कोई नेता नहीं था। माला पहनता हुआ कोई नंबर नहीं था सीटें दिखाता हुआ।

उसमें एक सफाई कर्मचारी है शायद। नहीं नहीं एक सफाई कर्मचारी नहीं एक गरीब आदमी जो रद्दी इकट्ठी कर रहा है जो बेच के शायद उसको ₹50 मिल जाए ₹100 मिल जाए उसका खाने का काम हो जाए और रद्दी में इंदिरा गांधी का पोस्टर है। हां ये बस ये जो बात है देखिए कि मैं जब मैंने आपको बताया था कि इंदिरा गांधी जो के जब इमरजेंसी डिक्लेअ हुई तो पॉलिटिकल स्टोरीज तो बिल्कुल नहीं थी। सोशल और कल्चरल भी जो थी सारी एक्टिविटीज दे केम डाउन। नथिंग वास हैपनिंग इन द कंट्री। सो मी एज अ वाइल्ड एक्सप्लोरर आई कुड सट आइडल डूइंग नथिंग। तो मैं जामा मस्जिद की तरफ जाता था। वहां एक रास्ते में दीवार आती थी। दीवार पे बड़ी ग्रेविटी और मैसेजेस होते थे। संडे को वहां बाजार लग जाता था। तो मैंने सोचा चलो यार यहीं तस्वीरें खींचा करूंगा। मैं हर दो चार दिन के बाद वहां सामने आके अक्रॉस द रोड बैठ जाता था। ल से देखता रहता था। इमरजेंसी की वजह से आई वास पुश् टू दी दिस बॉल टेकिंग पिक्चर्स देयर फॉर ऑलमोस्ट टू इयर्स ऑफ एंड ऑल यू हैव वि संडे मैगजीन बैक एट दैट नहीं आई वास वि द स्टेट्समैन न्यूज़पेपर एट दैट टाइम स्टेट्समैन वास वेरीेंट न्यूज़पेपर यस तवलीन सिंह हैज़ रिटन इन डिटेल

अबाउट इट किसने? तवलीन सिंह। अच्छा इट वाज़ बिकॉज़ वी हैड टू बिगिन विद द ब्रिटिश एडिटर इवान चार्टन अ वंडरफुल एडिटर एंड जर्नलिस्ट एंड दे कुड केयरलेस कौन सी पॉलिटिकल पार्टी पावर में है कौन सी नहीं है। सो स्टेट्समैन वाज़ वेरी एनालिटिकल वेरी स्ट्रांग ईमानदार न्यूज़पेपर। फिर उसके बाद तो 77 के बाद 80ज में एक इंडियन बिकम देयर मैनेजर डायरेक्टर एंड ही डिस्ट्रॉयड द शेप ऑफ थिंग्स एनीवे तो स्टेट्स वन में मैं तब काम करता था और अच्छी बात ये भी थी कि मेरे न्यूज़ एडिटर जो थे उनका भी मुझे नाम लेना चाहिए शर्मा जी थे और उनके चश्मे जो थे वो शायद -8 होंगे या 10 होंगे तो और इतने कंसर्नड न्यूज़ एडिटर थे चार्टन इतने कमाल के एडिटर थे तब हमारे एडिटर होता था कुलदीप नायर जिसका नाम आप सब जर्नलिस्टों ने सुना होगा ही वास हाईली रिस्पेक्टेड तो वी वर्क विद दिस निहाल सिंह कुलदीप नायर मुलगा दी बिग गाइस आई हैव वर्क विद फ्रैंक मॉरिस बिकॉज़ दैट ही वास इन इंडियन एक्सप्रेस अनदर ग्रेट एडिटर।

उस जमाने में जब एडिटर्स एडिटोरियल लिखते थे तो सरकारें हिलने लगती थी। आज कोई लिख के दिखा दो। हिम्मत है तो मैं चैलेंज करता हूं। समझे? तो कहने का मतलब ये है कि ये हुआ तो मैं उस वॉल पे बैठता था और तस्वीरें खींचता था। तो फिर जब इमरजेंसी खत्म हो गई मैंने छोड़ दिया। तो एक दिन मैं वहां नहीं इलेक्शन के लिए हां इलेक्शन वहां एक दिन के इलेक्शन इंडिया में होते थे। दूसरे दिन सुबह काउंटिंग शुरू होती रात को शाम तक रिजल्ट तो मैं इलेक्शन के लिए जामा मस्जिद एरिया में क्योंकि वहां पे आर्चेस में पुरानी आर आर्काइवल हेरिटेज में भी वहां पे बूथ बन जाते थे लिटिल मोर इंटरेस्टिंग देन गोइंग टू अ टेंट और अ न्यू बिल्डिंग तो मैं वहां फोटोग्राफ करके 5:00 बज गए थे इलेक्शन खत्म हो गए थे मतलब वोटिंग खत्म हो गई थी तो मैं करके उसी दीवार के साथ से आ रहा था और मैंने देखा उस जमाने में जो एक्सेस हुई थी इमरजेंसी की वो थी हम दो हमारे दो कि जबरदस्ती आपको ले जाते थे आपकी वइसमी कर दी जाती थी इंद्रा हटाओ इंद्री बचाओ हां तो ये सब बातें होती थी तो पीपल

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