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शादी से पहले यहां दूल्हा क्यों पीता है मां का दूध? आंचल पीना पर बंटा इन्टरनेट

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[संगीत] यह वीडियो आपने अब तक देख लिया होगा। लेकिन इसमें सबसे ज्यादा चर्चा जिस चीज की हुई वो थी एक अनोखी रस्म आंचल पीना। शादी से पहले दूल्हा अपनी मां का दूध पीता है। सुनने में अजीब लग सकता है लेकिन इसका मतलब बहुत गहरा है। यह रस्म कहती है कि तुम चाहे जितने बड़े बन जाओ मां का कर्ज कभी नहीं चुका सकते। सिर सांटे रुख रहे तो भी सस्तो जान। इसका मतलब है कि अगर सिर कटवाकर भी एक पेड़ बचता है तो यह सौदा फिर भी सस्ता है।

यह सिर्फ एक लाइन नहीं यह एक पूरी जिंदगी जीने का तरीका है। आज जब दुनिया पर्यावरण बचाने की बात कर रही है तब सदियों पहले एक समाज था जिसने इसे अपनी पहचान बना लिया था बिश्नोई समाज और इसी समाज का यह वायरल वीडियो है।

आज फिर से यह समाज चर्चा में है क्योंकि एक तरफ इसी समाज से निकला नाम है लॉरेंस बिश्नोई तो दूसरी तरफ उसी मिट्टी से निकले एक ईमानदार अफसर कृष्णा कुमार बिश्नोई जिन्होंने अंशिका वर्मा के साथ शादी रचाई और अपनी परंपराओं को फिर चर्चा में ला दिया। बिश्नोई समाज की कहानी शुरू होती है 15वीं शताब्दी में जब गुरु जंभेश्वर यानी जंभ जी ने 29 नियम बनाए। 20 और नई यानी 29 यहीं से बना बिश्नोई। इन 29 नियमों में सिर्फ धर्म नहीं जिंदगी जीने का पूरा तरीका छुपा हुआ है। सबसे बड़ा नियम प्रकृति की रक्षा। इस समाज में पेड़ काटना पाप है। जानवरों को मारना मना है। मांस खाना वर्जित है और यही वजह है

कि इनके गांव में हिरण ऐसे घूमते हैं जैसे वह किसी जंगल में नहीं अपने घर में हो। यहां एक मां सिर्फ अपने बच्चे को नहीं बल्कि अनाथ हिरण के बच्चे को भी दूध पिलाती है। बिश्नोई समाज सिर्फ जीवन में ही नहीं मृत्यु में भी प्रकृति का ध्यान रखता है। जहां ज्यादातर हिंदू समाज में अंतिम संस्कार में शव जलाया जाता है।

वहीं बिश्नोई समाज शव को दफनाता है ताकि पेड़ों की कटाई ना हो। सोचिए यहां तक कि मौत के बाद भी प्रकृति को नुकसान ना हो। यही सोच है और शायद यही वजह है कि बिश्नोई समाज सिर्फ एक समुदाय नहीं एक सोच है, एक सबक है और एक ऐसा रास्ता जो आने वाली दुनिया को बचा सकता है।

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