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अमेरिका-ईरान समझौता,14 हजार करोड़ कैश का राज़!

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अमेरिका ने ईरान को 14,000 करोड़ कैश हवाई जहाज से आखिरकार क्यों भेजा? और ट्रंप ने इसे फिरौती क्यों कहा है? आखिरकार किसने अमेरिका से 14,000 करोड़ ईरान को भेजा है? कौन है वो? नमस्कार, आप देख रहे हैं न्यूज़ 18 का डिजिटल प्लेटफार्म। मैं हूं आपके साथ श्रुति श्रीवास्तव। ईरान से जारी जंग के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आज गुरुवार को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन के दरमियान पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ हुई ईरान की न्यूक्लियर डील और 1.7 अरब डॉलर की कैश भुगतान का खासतौर से जिक्र किया। भारतीय रुपए के हिसाब से यह रकम करीब ₹14,000 करोड़ बैठती है। ट्रंप ने इस डील को बकवास करार दिया और ईरान को दी गई 1.7 अरब डॉलर की भुगतान राशि को ईरान को खरीदने की कोशिश बताया। हालांकि इस डील को ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में ही रद्द कर चुके हैं। ट्रंप ने कहा मैंने बराक हुसैन ओबामा के ईरान न्यूक्लियर डील को खत्म कर दिया। यह एक डिजास्टर था। ओबामा ने उन्हें 1.7 बिलियन कैश दिया। ग्रीन कैश, वर्जीनिया, डीसी और मैरीलैंड के बैंकों से पैसा निकालकर हवाई जहाजों से भेजा गया ताकि ईरान का सम्मान और उसकी वफादारी खरीदी जा सके। लेकिन ईरान ने यह काम नहीं किया। उल्टे ईरान ने हमारा मजाक उड़ाया और अपना न्यूक्लियर बम बनाने का मिशन जारी रखा।

आज हम आपको यह बताएंगे कि जीसीपीओए डील आखिर क्या थी और ओबामा प्रशासन की ओर से ईरान को 1.7 अरब डॉलर कैश हवाई जहाज में क्यों भरकर भेजे गए थे। चलिए इस डील का पूरा नाम है जॉइंट कॉम्प्रहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन 2025 यानी कि जीसीपीओए 2000 माफ़ करिएगा 2015। यह डील ओबामा प्रशासन के समय अमेरिका, ईरान और P5 प्लस वन देशों जैसे कि अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी के बीच हुई थी। डील का मकसद युद्ध के बगैर ही ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना था। बदले में ईरान से यह कहा गया कि उसे अपना यूरेनियम संवर्धन सीमित करना होगा। पुरानी मशीनें हटानी होंगी। न्यूक्लियर साइड्स पर अंतरराष्ट्रीय जांच की अनुमति देना होगा और 15 साल तक सख्त नियम भी मानना होगा। डील के बाद में ईरान पर से कड़े आर्थिक प्रतिबंध जैसे कि सेंसेक्स हटाए गए। तेल निर्यात और वैश्विक व्यापार की छूट मिली और विदेश में फंसा पैसा वापस मिलने लगा। इस पर ट्रंप का कहना है कि यह डील बहुत ही कमजोर थी क्योंकि इसमें समय सीमा तय की गई थी। 15 साल बाद नियम खत्म हो जाते हैं। और इसके अलावा बैलेस्टिक मिसाइल प्रोग्राम शामिल नहीं किया गया था और ईरान को जो मिला पैसा वह उसका इस्तेमाल प्रोग्जी ग्रुप यानी कि हिजबुल्ला जैसे ग्रुप को सपोर्ट करने में कर सकता था। इसीलिए 2018 में उन्होंने अमेरिका को इस डील से बाहर निकाल लिया और फिर से नए प्रतिबंध लगा दिए। वहीं $1.7 बिलियन कैश का आखिर मामला क्या है वह समझिए।

ट्रंप अक्सर इस पैसे का जिक्र करते हैं। साल 2016 में ओबामा प्रशासन ने ईरान को करीब 1.7 अरब डॉलर दिए थे। तो इसमें सच्चाई क्या है? यह कोई नई मदद या रिश्वत नहीं है। बल्कि यह 1979 की ईरानी क्रांति से पहले का पुराना बकाया था। तब ईरान ने अमेरिका से मिलिट्री उपकरण खरीदने के लिए एडवांस पेमेंट किया था। लेकिन क्रांति के बाद यह डील रद्द हो गई। हथियार नहीं दिए गए और पैसा फंस गया। समझौते के तहत कुल राशि 400 मिलियन मूल राशि और इसमें 1.3 बिलियन ब्याज जुड़ गया और उस समय ईरान का बैंकिंग प्रतिबंध थे। इसीलिए बैंक में पैसा ट्रांसफर नहीं हो सका। पैसा विदेशी मुद्रा यानी कि यूरो या फिर स्विस फ्रैंक में पैेट्स यानी कि ढेर भरकर हवाई जहाजों से भेजा गया। यहीं से प्लेन फुल ऑफ कैश यानी कि प्लेन फुल ऑफ कैश वाली चर्चा शुरू हो गई। अब इस पर क्यों विवाद हो गया है वह समझिए। डोनाल्ड ट्रंप और उनके समर्थक इसे रैंसम यानी कि फिरौती बताते हैं [नाक से की जाने वाली आवाज़] क्योंकि यह सब कुछ ईरान के कुछ बंधकों की रिहाई के समय हुआ था। ओबामा प्रशासन का कहना था कि यह कानूनी सेटलमेंट था। अगर कोर्ट केस हारते तो ज्यादा पैसा देना पड़ सकता था। दोनों डील्स को अलग-अलग बताया गया।

हालांकि पैसा पुराना बकाया था लेकिन जिस तरीके से कैश भेजा गया उससे विवाद बढ़ गया। वहीं ईरान में 1979 में हुई ईरानी क्रांति विवाद की मुख्य वजह बनी। ईरानी क्रांति आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में मानी जाती है और इस क्रांति ने ना सिर्फ देश की सत्ता बदली बल्कि अमेरिका के साथ रिश्तों को भी पूरी तरह से पलट कर दुश्मनी में बदल दिया। क्रांति से पहले क्या थे ईरान में हालात वो भी बताते हैं। साल 1979 यानी कि साल 1989 से पहले ईरान पर शाह मोहम्मद रजा शाह पहलवी का शासन हुआ करता था। वह अमेरिका के करीबी माने जाते थे। जिमी कार्टर समेत अमेरिकी नेतृत्व के साथ उनके मजबूत संबंध थे। ईरान अमेरिका से हथियार और सैन्य उपकरण खरीद रहा था। इसी दरमियान ईरान ने अमेरिका को बड़ी रकम एडवांस में दी थी जो बाद में विवाद का कारण बनी। शाह के शासन के खिलाफ लोगों में नाराजगी बढ़ने लगी। इसकी मुख्य वजह थी तानाशाही और विरोधियों पर सख्ती। अमीर गरीब के बीच बढ़ती खाई, पश्चिमी असर और पारंपरिक मूल्यों में कमी शामिल थी। कई लोगों को लगता था कि सरकार जनता के बजाय अमेरिका के हितों के लिए काम कर रही है।

क्रांति कैसे हुई? तो 1978 से लेकर 1989 तक में देश भर में विरोध प्रदर्शन शुरू होने लगे और जल्द ही बड़े आंदोलन में बदल गया। इस आंदोलन का नेतृत्व धार्मिक नेता रोह्लाह खुमैनी ने किया। शाह को देश छोड़कर भागना पड़ा। खुमैनी सत्ता में आए और ईरान अब इस्लामिक रिपब्लिक बन गया और इस तरह से राजशाही सत्ता खत्म हो गई और धार्मिक नेतृत्व शुरू हुआ। वहीं अमेरिका ईरान के रिश्ते आखिरकार क्यों बिगड़े? क्यों कड़वाहट आई? क्रांति के बाद सबसे बड़ा घटनाक्रम था ईरान बंधक संकट। तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया गया।

52 अमेरिकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया। इसके बाद दोनों देशों के रिश्ते पूरी तरह से टूट गए और प्रतिबंधों का दौर शुरू हो गया। अरबों डॉलर का विवाद कैसे शुरू हुआ वह भी समझिए। क्रांति से पहले ईरान ने अमेरिका को हथियार खरीदने के लिए एडवांस भुगतान किया था। लेकिन क्रांति के बाद डील रद्द हो गई। अमेरिका ने ना तो हथियार दिए और ना ही तुरंत पैसा लौटाया। यह पैसा दशकों तक फंसा रहा और बाद में 2016 में बड़ा उबारा के समय इसे लौटाया गया। वहीं ईरानी क्रांति सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं थी बल्कि एक ऐसा मोड़ था जिसने देश ईरान की राजनीतिक व्यवस्था बदल दी। अमेरिका के साथ रिश्ते खराब कर दिए। आज तक जारी तनाव की नींव रख दी गई। यही वजह है कि आज भी ईरान और अमेरिका के बीच टकराव की जड़े 1989 की इसी क्रांति से जुड़ी हुई हैं।

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