दुनिया अभी टेरिफ वॉर के चलते ग्लोबल सुस्ती से उभरी नहीं थी कि मिडिल ईस्ट से आई युद्ध की खबरों ने एक बार फिर वैश्विक बाजारों की नींद उड़ा दी है। ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव का असर कई देशों के शेयर मार्केट पर देखने को मिल रहा है जिसमें भारत भी शामिल है और अगर यह तनाव एक फुल स्केल युद्ध में बदलता है तो भारत के लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं होगा। हालांकि देश के पास बड़ी मात्रा में विदेशी करेंसी मौजूद है जिससे अभी परेशान होने की जरूरत नहीं है।
आइए समझते हैं इस युद्ध का आपकी जेब, रसोई और पोर्टफोलियो पर क्या असर पड़ सकता है। नमस्कार, मैं हूं आपके साथ ममता तिवारी। आप देख रहे हैं न्यूज़ 18 का डिजिटल प्लेटफार्म। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर सिर्फ उस इलाके तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर देखने को मिलता है। इजराइल और अमेरिका के हमलों के बाद ईरान की जवाबी कारवाही से हालात और गंभीर हो गए हैं। इस कारवाही में ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत के बाद लगातार स्थितियां बिगड़ रही हैं। ऐसे में भारत के लिए यह समझना जरूरी है कि वह ईरान से क्या-क्या आयात करता है और जंग की स्थिति में किन चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं। सबसे पहले भारत के लिए ईरान क्यों अहम है?
वो समझ लीजिए। भारत और ईरान के रिश्ते पुराने हैं। 1950 में दोनों देशों ने औपचारिक राजनयिक संबंध बनाए थे। 1970 के दशक के बाद व्यापारिक रिश्ते और मजबूत हुए। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद दोनों देशों ने कई बार वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था अपनाई जिसमें रुपया रियाल तंत्र भी शामिल रहा। ईरान भारत के लिए ऊर्जा, समुद्री व्यापार, मार्ग और मध्य एशिया तक पहुंच के लिहाज से अहम देश है। इसी वजह से भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह में निवेश किया है जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सामान पहुंचाने का एक रणनीतिक रास्ता है। भारत ईरान से क्या-क्या आयात करता है? पहला कच्चा तेल। ईरान कभी भारत के लिए प्रमुख तेल आपूर्ति करता रहा है। अमेरिकी प्रतिबंध के बाद आयात में कमी आई।
लेकिन वैश्विक बाजार में ईरान से सप्लाई बाधित होने पर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर भारत में पेट्रोल डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ हो सकता है। दूसरी चीज है पेट्रोकेमिकल और केमिकल उत्पाद। भारत ईरान से कुछ खास पेट्रो केमिकल्स और औद्योगिक केमिकल्स की भी मांगता है। इसका इस्तेमाल प्लास्टिक, उवरक, दवा और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में होता है। सप्लाई रुकने पर उत्पादन लागत बढ़ सकती है। अब तीसरी चीज है सूखे मेवे और फल। ईरान से पिस्ता, खजूर, केसर और कुछ अन्य सूखे मेवे भारत आते हैं।
इसके अलावा सेब और किवी जैसे फल भी आयात होते हैं। जंग की वजह से सप्लाई चेन बाधित होने पर इनकी कीमतें बढ़ सकती है। चौथी चीज है कांच और अन्य औद्योगिक सामान। कुछ खास ग्लास वियर और औद्योगिक उत्पाद भी ईरान से भारत आते हैं। इसका असर सीमित हो सकता है। लेकिन कीमतों में बढ़ोतरी से छोटे उद्योग प्रभावित हो सकते हैं। तेल सप्लाई और हॉर्मोज स्टेट का खतरा भारत की ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से जुड़ा है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोस दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है।
भारत के कुल कच्चे तेल आयात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है। विशेषकों के मुताबिक अगर इस समुद्री मार्ग में रुकावट आती है तो भारत के कुल मासिक आयात का करीब 50% तक प्रभावित हो सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होगा और भारत का आयात बिल बढ़ेगा। भारत के लिए इतना अहम क्यों है हॉर्मज स्ट्रीट? तो देखिए ईरान और ओमान के बीच स्थित हॉर्मोज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है। भारत अपनी जरूरत का अधिकतर कच्चा तेल सऊदी अरब, इराक, कुवैत और यूएई जैसे देशों से मंगवाता है।
जिसका बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है। केप्लर के लीड रिसर्च एनालिस्ट सुमित रितोलिया के मुताबिक अगर इजराइल ईरान के तेल ठिकानों पर हमला करता है या ईरान इस रास्ते को ब्लॉक करता है तो सप्लाई चेन पूरी तरह से बंद हो जाएगी। इसका असर भारत के साथ-साथ ग्लोबल ऑयल मार्केट पर भी पड़ेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत अपनी जरूरत का करीब 26 लाख बैरल कच्चा तेल क्रूड ऑयल रोजाना इसी रास्ते से मंगवाता है। केप्लर के डाटा के मुताबिक जनवरी फरवरी में भारत के कुल मंथली ऑयल इंपोर्ट का करीब 50% हिस्सा हॉररमज के रास्ते ही आया है।
नवंबर दिसंबर 2025 में यह आंकड़ा 40% था जो अब बढ़ गया है। सूत्रों का कहना है कि अगर होमज का रास्ता बंद होता है तो भारत दूसरे विकल्पों पर विचार कर सकता है। इसमें सऊदी अरब की ईस्ट वेस्ट पाइपलाइन और यूएई की अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन शामिल है। यह दोनों पाइपलाइन इसी मकसद से बनाई गई है ताकि होरमुच के रास्ते का इस्तेमाल किए बिना तेल सप्लाई जारी की जा सके और देखिए शिपिंग और बीमा लागत में बढ़ोतरी मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से रेडसी कॉरिडोर और आसपास के समुद्री रास्तों पर जोखिम बढ़ जाता है।
जहाजों का बीमा महंगा हो जाते हैं और माल डुलाई की लागत बढ़ती है। इसका असर सिर्फ तेल या नहीं बल्कि बाकी आयात निर्यात पर भी पड़ता है। लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ने से भारत के एक्सपोर्ट महंगे हो सकते हैं। जिससे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है। आम लोगों पर सीधा असर क्या पड़ेगा? अगर तनाव लंबा खींचता है तो इसका असर पेट्रोल और डीजल के दाम, रसोई गैस, हवाई किराया, ट्रांसपोर्ट लागत, खाद्य तेल और पैकेज सामान, सूखे मेवे और आयातित फल पर भी देखने को मिल सकता है।
ऊर्जा महंगी होने से लगभग हर सेक्टर की लागत बढ़ती है जिससे महंगाई बढ़ सकती है। तो तैयार रहिए अगर यह जंग बढ़ती है तो इन सब चीजों के रेट बढ़ सकते हैं और इनके रेट बढ़ने से आपके जेब से पैसा अधिक जाएगा। तो बस प्रे करिए कि यह जंग यहीं पर समाप्त हो जाए। वैसे भी जंग से किसी का भी भला नहीं हुआ बल्कि इससे बाकी देशों को भी बड़ा नुकसान होने वाला है।